Sunday, 18 February 2018

साँझा-लघुकथा-संग्रह (व्योरा)

इसके लिए हम आभारी हैं आप सभी के ...
आज १८/२/२०१८ तक कुल दस #साँझा-लघुकथा-संग्रह पुस्तक  रूप में आ चुकी हैं | जिनमें #बत्तीस #लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं | चार आधी रूप में अधर में है, एक की कोई सुचना नहीं मिली | यानी पांच हाथ में आ नहीं पायी हैं | मतलब यह कह सकते हैं कि कुल पंद्रह संग्रह लघुकथा के हो गये ...बहुत हैं न ! अबतक जो संग्रह हाथ में आई है उनमें कोई भी कथा दूसरी संग्रह में रिपीट नहीं हुई है |
१-- 'मुट्ठी भर अक्षर' साँझा-लघुकथा-संग्रह
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_9.html
२--'लघुकथा अनवरत' सत्र २०१६ लघुकथा-साँझा-संग्रह
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_23.html
३--'अपने अपने क्षितिज' साँझा -लघुकथा-- संग्रह -
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_24.html

४-- "लघुकथा अनवरत" साँझा-लघुकथा-संग्रह (२०१७)-
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/12/blog-post_25.html

५--‘सपने बुनते हुए' साँझा-लघुकथा-संग्रह -
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post.html

६-- "आधुनिक हिंदी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ" साँझा-लघुकथा-संग्रह - http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_78.html

७--"नई सदी की धमक" साँझा-लघुकथा-संग्रह -
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_51.html

८-- 'सफ़र संवेदनाओं का' -साँझा-लघुकथा-संग्रह -
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_93.html

९-- "आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह --
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_80.html

१०.'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह -
http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_17.html

लघुकथा.कॉम वेबसाइट के संचयन में

लीजिए खुशी का मटका ऐसे भी फूटता है, एक साथ पांच कथाएँ फेवरेट वेबसाइट लघुकथा.कॉम पर। 
संजोग देखिये fb फरवरी माह का ही अपडेट दिखा रहा ब्रेकिंग न्यूज़ नामक रचना छपने का।😊😊शायद फ़रवरी महिना लकी हमारे लिए ..

बड़ी उत्सुकता थी कौन-कौन सी कथाएं लगीं। पांच लगीं हैं जिनमें उपाय अपनी पसंदीदा रचना । वैसे तो अपनी सारी उँगली बराबर, सबको लिखने में हमें ज्यादा नहीं सोचना समझना पड़ा। 

बस उपाय हमें पसन्द थी | लेकिन दो एक को पसंद नहीं आयीं थी। यादास्त  कमजोर अपनी। अब लिखने में यह याद कि पसन्द नहीं आयी थी लेकिन यह याद नहीं कि कैइसी थी जो पसन्द न आई और क्या कुछ हम परिवर्तन करें उसके बाद । वैसे उपाय obo में लिखी पैंतरा का बिगड़ते बिगड़ते सुधरा रूप है  
खैर कोई न अब खुशियों में शामिल होइए आप सब भी


पढ़कर पञ्च परमेश्वर को ! अरे कथाओं को और बताइये आपको कौन सी बेहतर लगी या नहीं भी लगी |😊
-तोहफ़ा.
.पछतावा
-परिपाटी
--उपाय
--अमानत

तोहफ़ा इस लिंक पर ..
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/11/blog-post_27.html
और  चारों कथाएँ इस लिंक पर ..
 http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_93.html


आभार सम्पादक द्वय Sukesh Sahni भैया औरRameshwar Kamboj Himanshu भैया का तहेदिल से। बड़े आशीर्वाद बनाये रखे तो मार्ग सहज होता जाता और खुशकिस्मत की सब बड़ो का आशीष बना हुआ है। 
बस एक क्लिक पर पढ़े...😊

http://laghukatha.com/लघुकथाएँ-15/

Saturday, 17 February 2018

लेखन का दुःख (व्यंग्यमुखी)

हाँ तो सब तैयार हैं न? हमारे यह कहते ही सब मुँह खोल आश्चर्यचकित हो सुनने लगें | माने हमऊ नेता माफ़िक होई गये चंद मिनट खातिर | शुक्र है आदतन भाइयों-बहनों नहीं बोले थे हम, वरना तो लोग जय-जयकार करने लगतें भई | ऊ क्या है कि हमको ई जयकारा छटांग भर भी नहीं भाता | इस लिए जुबान को कंटोल करना पड़ा, बटन तो खटखट चल पड़ी थी, चलने के बाद उसे भी डिलीट मारना पड़ा | 
अच्छा हाँ, अपनी भाषा सही रखें हम, नहीं तो सब इसी पर जंग जीत लेंगे | हाँ तो तैयार हैं न बिल्कुल मीडिया के जैसे, कैमरा और माइक लेकर। और हाँ ख़ुफ़िया कैमरा लेकर भी, क्योंकि बहुत से लोग इसी खास कैमरे से देख सकेंगे। अपने विरोधियों की गतिविधियों को देखना इसी कैमरे से तो आसान होता है ! हाँ तो अच्छी तरह से सभी ने अपने-अपने कैमरे, अरे भई सामान्य कैमरे की कौन बेवकूफ बात कर रहा है, ख़ुफ़िये (कुछ और समझते हैं, तो उस आपकी समझ में हमारी लेखनी का कोई दोष नहीं है) कैमरे यथास्थान फीट कर लिए हैं न !
यह अपना भारत भी बड़ा अजीब देश है और भारतवासी उससे भी ज्यादा अजीबो-गरीब |

यहां कोई बस बकरा बन भर जाए, सब उसे हलाल होते देखना चाहते हैं | क्या राजा क्या रंक! क्या अमीर, क्या गरीब! क्या कलम के हस्ताक्षर और क्या अँगूठा छाप। यहाँ तक की, कि बकरे भी बकरा को हलाल होता देख मजा लेना चाहते हैं। तो रहिये तैयार और पढ़िए यह --!
हाँ तो हम बकरा बनने को तैयार क्या हुए, सब हिंगलिश- संस्कृत- हिंदी -अंग्रेजी में दुई के पाँच पढ़ने लगें और हमें "शुभष्य शीघ्रं" की शिक्षा देने लगें | अब क्रोध में हमने शब्दों की तलवार उठायी तो थी, पर सोचे राय ले ली जाय कि सबका दिन ख़राब करें या रात में परी के सपने में आने के तार तोड़ दें |

राय मांगना भर था कि सब बोल उठे कि हंगामा हो तो अभी ही हो | हंगामे के समर्थन में नारे लगाने लगें | माने मजा सबको तुरंत चाहिए | कोई हलाल हो इससे किसी को कोई ख़ास मतलब नहीं | हु-हा की लाठी लेकर चल पड़े, माने शांत बैठे गाँधी भक्त भी ! हिंसा चाहने वाले तो इन मामलों में हमेशा ही सजग रहते हैं !

ऐसा विरोधाभाषी आचरण वाला आश्चर्य तो भारत में ही सम्भव है | कहने का अभिप्राय है कि मन में राम और बगल में छूरी रखने वाले भी हैं कई और कई तो ख़ास रूप से तभी दिखे जब यह गलती से अनाउंस हो गया हमारे मुख से | कई गहरे पानी में धक्का देने को आतुर दिखें, बिना यह जाने कि हमें तैरना आता भी या हम ऐसे ही डींग हांक दिए |

शाम को आतंकवादी आक्रमण करते हैं यह आठवाँ अजूबा आज ही पता चला हमें | हमने आव देखा न ताव हाँक दिया कि "चिंता न करा, हम उनहू से भिड़ी जाब, मरब या मारब" लेकिन सच पूछिये तो डर तो लगा | क्योंकि यहाँ तो सब मौके की ताक में ही रहते हैं कि कब कोई किसी को कोई कुछ कहें तो वो भी अपनी रोटी सेंक लें फुर्ती से | रोटी सेंकने वाले इतने उतावले रहते हैं कि सर फुटव्वल भी कर लेते हैं आपस में ही |
फिर चिंतक आगाह किए कि भिड़ना ठीक नहीं ! हम बाज क्यों आते, बोल दिए - ब्रह्मास्त्र है अपने पास | शुक्र है जुकरबर्ग भैया जानते थे कि यह फेसबुक भारत में कत्लेआम मचा देगा | गालियों-धमकियों का एक नया ग्रन्थ लिखवा देगा इसलिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र की व्यवस्था आपातकालीन स्थिति के लिए रख छोड़ी थी | बस उसी ब्रह्मास्त्र के बलबूते हम जैसे लोग सर्वाइब कर रहे हैं बंधुओं | हमें भी इस ब्रह्मास्त्र बड़ा गुमान है और प्रार्थना है कि अपडेट के नाम से भविष्य में हमसे यह हथियार नहीं छीना जाए |

हाँ तो खुफियागिरी वाले ज्यादा ध्यान दें | और यह खबर वाइरल कर दें कि आदमी से जितना सम्भले उतना ही भार उठाए | तैरना न जाने तो  हमारी तरह पानी में जबरजस्ती ही नहीं कूद पड़े, बिना सोचे-समझे | वरना लेने के देने पड़ सकते हैं |

लड़की से शादी वक्त अक्सर सवाल पूछा जाता है बिटिया खाना बना लेती हो ? हाँ कहने पर फिर सवाल उछलता है -बीस-पचास का बना लोगी ? हाँ कहने पर सास ठहर जाती है और पसंद कर लेती है | लेकिन लड़की की माँ तैस में आकार यह कह दें कि हमारी लाड़ो तो पूरी बारात खिला लेगी ! और तो और शादी की पूरी व्यवस्था सम्भाल लेगी | तो भैये यह सही है क्या ? नहीं न |
आदमी हर काम और दस हाथ के सम्भलने वाला काम अकेले नहीं कर सकता | इसलिए उसे उतना ही काम अपने सिर पर लेना चाहिए, जितना वह सुचारू रूप से कर सकें | माने हम खामखाँ सीख देने पर उतारू हो गये हैं |
अब मुद्दे की बात पर आते हैं ! जिसके फलस्वरूप ये पांच सौ शब्दों का तानाबाना बुन उठा |
हमारी कथा "बदलाव" छपी है उस "बदलाव' में लिंग ही बदल दिया | उस कथा की ऐसी घटिया खड़ी करी गयी है कि हम पढ़कर क्रोधित हो उठे | घंटो आँख फोड़कर लिखने और गलतियों पर बारीकी से निरिक्षण करने का इतना कष्ट हुआ कि पूछिये ही मत |

उस किताब से सम्बन्धित आठ सम्पादक लोग हैं | किसे सुनाए समझ ही नहीं आ रहा है | इमेल का भी अता-पता नहीं मिल रहा है, घंटो मशक्कत कर लिए  | हम फोन भी करें कि जाने आखिर हमारा असली मुलजिम कौन है ! पर फोन उठा नहीं |  तो क्रोध की सीमा पार हो गयी, जो फेसबुक पर पोस्ट रूप में चिपकी | लेकिन फिर देखा कि एक लाइन नहीं पूरा पैरा ही तहसनहस हुआ है | तो फिर क्या उठा लिए कलम और आ गये जनता दरबार में | मेहनत पानी में नहीं जाये इसका ख्याल तो सम्पादकों को रखना ही होगा | अपनी टांग अड़ाने से अच्छा हैं जैसा लेखक दे हुबहू वही छाप दिया जाय | सम्पादन के नाम से कथा रूपी शरीर के पेट का आपरेशन के बजाय दिमाग का आपरेशन न कर दिया जाय ! फान्ट बदलने की गलती तो आदमी बर्दास्त कर सकता पर इस तरह की गलती असहनीय है ! है न !!

देखिये आप सब भी इस कथा को...इतनी गलतियाँ ..पिछली बार के सम्पादक ने पता ही बदल दिया था, इस बार स्त्रीलिंग का पुलिंग में वार्ता कर दिया गया--

सही कथाएँ इस लिंक पर ..

http://kavitabhawana.blogspot.in/2018/02/blog-post_17.html

१०) 'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह

'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह प्रकाशन -भाषा सहोदरी हिंदी |
सम्पादक - कुल आठ सदस्य मुख्य सम्पादक श्रीमती कांता राय |
विमोचन- दिल्ली के "हँसराज कॉलेज" में जनवरी २०१८ को हुआ |
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'सहोदरी लघुकथा' साँझा-लघुकथा-संग्रह जनवरी -२०१८ में पांच कथाएँ प्रकाशित हुई हैं |
आठ सम्पादको की देखरेख में कुल ७० नवांकुरो के साथ १५ वरिष्ठ अतिथि लघुकथाकारों के लघुकथाओं से सजी ३८० पेज की किताब .. |
भाषा सहोदरी हिंदी द्वारा लघुकथा अधिवेशन 2018, हँसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिनांक : 15 जनवरी 2018 को सम्पन्न हुआ जिस में सौभाग्य से हम उपस्थिति रहे |
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प्रकाशित पांच लघुकथाएँ-
१..उम्रदराज प्रेमी
२ -रंग-ढंग-
३--बदलाव
४--सबक
५.-सभ्यता के दंश
---००----१--उम्रदराज प्रेमी~


"अरे विनोद ! क्या हुआ बीमार से लग रहे हो | आजकल टहलने भी नहीं आते ?"
"क्या बताऊँ यार ?"
"अरे बताओ तो सही ,शायद मैं मदद कर सकूँ !"
" यार, वह जो कोने वाली बेंच पर बैठी औरत है न, बस उससे प्रेम सा हो गया है |"
"वह जवान और तुम 'पिलपिले आम' आज गये कि कल ..."
यह बात व्यंग-सी चुभी ! तीखे स्वर में विनोद बोल उठा - "आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता, सुना नहीं कभी क्या? और वह भी कोई जवान नहीं है, चालीस से ऊपर की तो होगी ही ! "
"सुना है भाई ! मैं तो यूँ ही मज़ाक कर रहा था | कैरियर बनाने के चक्कर में शादी नहीं की उसने और जब करनी चाही तो लड़के ही ना मिले |"
"फिर बात करने की कोशिश करो न ! तुम्हारी सहकर्मी रही है, तुमसे तो घुली-मिली है न |"
बात क्या करनी है, फाइनल समझो |वह तो खुद कहती है | 'दसियों घातक नजरों से अच्छा है एक जोड़ी आँखे 'प्यार भरी' नजर से देखे | चाहे नजर बूढी ही क्यूँ न हो |"
दोस्त की बात सुनते ही "उम्रदराज प्रेमी" अनायास ही जवान हो उठा |
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इसका बदला हुआ स्वरूप ब्लॉग और फेसबुक के इस लिंक पर ...

https://www.facebook.com/savita.mishra.3994/posts/1716223348415913
इसे 9 February 2015 को इस ग्रुप में लिखा था ..
https://www.facebook.com/groups/364271910409489/permalink/425160117654001/
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२--रंग-ढंग-

फेसबुक पुरानी यादों को ताज़ा कर रहा था कि अचानक चेतन को वे तस्वीरें दिखी, जो उसने पांच साल पहले पोस्ट की थी। अब ऐसी तस्वीरों की उसे जरूरत ही कहाँ थी। उसने स्क्रॉल कर दिया ।
...कभी समाजसेवा का बुखार चढ़ा था उस पर। 'दाहिना हाथ दें तो बाएं को भी न पता चले, सेवा-मदद ऐसी होती है बेटा।' वह भी ईमानदारी से माँ की दी हुई इसी सीख पर चलना चाहता था |
लोग एनजीओ से नाम, शोहरत और पैसा सब कमा रहें थे और वह, वह तो अपना पुश्तैनी घर तक बेचकर किराये के मकान में रहने लगा था।
पत्नी परेशान थी उसकी मातृभक्ति से | कभी-कभी वह खीझ कर बोल ही देती थी कि 'यदि मैं शिक्षिका न बनती तो खाने के भी लाले पड़ जाते' चेतन झुंझला कर रह जाता था।
यादों से बाहर आ उसने पलटकर फेसबुक पे वही अल्बम खोल लिया। तस्वीरों को देखकर बुदबुदाया- "सोशल साइट्स न होती, तो क्या होता मेरा। यही तस्वीरें तो थी, जिन्हें देखकर दानदाता आगे आये थे और पत्रकार बंधुओ ने अपने समाचार पत्र में जगह दी थी। फिर तो छपता गया, फेसबुक पर शेयर होता रहा। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा ।"
"सच में चुपचाप मदद करने और दिखा कर मदद करने में बहुत फर्क होता है | काम से नहीं, शोर मचाने से शोहरत और पैसा मिलता है। समाज सेवा तो मैं माँ के मुताबिक तब भी कर रहा था, अब भी कर रहा हूँ। बस अब जरा रंग-ढंग बदल दिया है।" बुदबुदाता हुआ माँ की तस्वीर के सामने नजरें झुका के खड़ा हो गया। अफसोस के साथ ख़ुशी भी थी उसके चेहरे पर |
"कोई आया है। अरे! कहाँ खोये हो जी!" पत्नी की आवाज ने उसे आत्मग्लानि से उबारा।
"कहीं नहीं ! बुलाओ उन्हें।"
"जी चेतन बाबू, ये एक लाख रूपये हैं। बस मुझे दान की रसीद दे दीजिए, जिससे मैं टैक्स बचा सकूँ।
"हाँ-हाँ क्यों नहीं मोहन बाबू, अभी देता हूँ।" कुछ ही देर बाद दो लाख की रसीद उनके हाथ में थमा मुस्करा रहा था वह |
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इसे ओबीओ में लिखा था |
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/32-5...
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३--बदलाव-

"चलो सुमीss! चलो भई..!"
"......."
"अरे कहाँ खो गयी, चलो घर नहीं चलना क्या?" चिल्लाते हुए बोला।
"मैं कौन?
"सुमी, तुम मेरी पत्नी, इन बच्चों की माँ और कौन?" भीड़ में खड़े होने का अहसास होते ही धीरे से बोला।
"नहीं मैं रावण हूँ" सुमी ने आँखे बड़ी करते हुए बोला|
"कैसा मजाक है सुमी | रावण का पुतला तुम्हारे ही सामने खड़ा है !"
"मजाक नहीं कर रही हूँ , मैं रावण हूँ | देखो रावण के दस नहीं, नौ सिर बने हुए है..|"
"वह गलती से बना दिया होगा, बनाने वाले ने | अब बकवास मत करो, चलो जल्दी घर।" झुंझलाते हुए वह बोला।
"नहीं ..., वह कमजोरी का दसवाँ सिर मैं थी |" दृणता से बोली वह।
"तुम रावण ! फिर मैं कौन हूँ ?" भीड़ को देखकर थोड़ा असहज हुआ। फिर मज़ाक उड़ाकर बात को आगे बढ़ाते हुए वह बोला |
"तुम राम हो, हमेशा से मैं तुम्हारें द्वारा और तुम्हारें ही कारण डरती आई हूँ | परन्तु अब नहीं, मैं अब जीना चाहती हूँ | अपने छोटी छोटी गलतियों की ऐसी भयानक सजा बार बार नहीं भुगतना चाहती हूँ !" आवेग में आकर सुमी बोलने लगी |
"मैंने तो तुमसे कभी तेज आव़ाज में बात भी नहीं की सुमी |" लोगों की भीड़ को अपनी तरफ आता देखकर बोला |
"तुमने बिना वजह सीता की परीक्षा ली | निर्दोष होते हुए भी वनवास का फरमान सुना दिया | फिर भी मर्यादा पुरुष रूप में तुम्हारी पूजा होती है और मैं, मैंने तो कुछ भी नहीं किया | मैं मर्यादित होकर भी युगों से अपमान सहती रही हूँ |" व्यथित हो रुंधे आवाज में बोलती जा रही थी।
"....पागल हो गयी है ! जाकर किसी मनोचिकित्सक को दिखाइए इन्हें !" पूरे पंडाल में कुछ ऐसे ही शब्द गूँजने लगे थे |
पुरुष के पक्ष में शोर सुनते ही राहुल का सीना चौड़ा हो गया।
उधर रावण का पुतला जलने लगा था, सब भयभीत हो पीछे हटने लगे थे । राम बने स्वरूप भी पीछे हटते हुए जरा सा लड़खड़ाये।
इधर सुमी का ललाट दीप्तिमान हो उठा था | क्योंकि कई स्त्रियाँ, भीड़ से निकलकर उसके समर्थन में आकार खड़ी हों गयी थीं । पुरुष आवाज दबने लगी थी। अपराधबोध से उबरा कमजोरी का दसवाँ सिर अब हर तरफ हुँकार भर रहा था।
कुछ ही देर में आगे-आगे चलने वाले पति अब अपनी-अपनी पत्नियों के हमकदम हों वहां से जाने लगे थे |
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https://www.facebook.com/events/720778064698355/permalink/723453121097516/
‎ लघुकथा प्रतियोगिता - बदलाव/परिवर्तन ......दिनांक २५/०५/२०१५ से दिनांक ०२/०६/२०१५ तक
25 May 2015
ब्लॉग के इस लिंक पर ..
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/01/blog-post_23.html
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४--सबक-

भोर सी मुस्कराती हुई भाभी साज सृंगार से पूर्ण अपने कमरे से निकली।
"अहा भाभी आज तो आप नयी नवेली दुल्हन सी लग रहीं है, कौन कहेगा शादी को आठ साल हो गए है।" ननद ने अपनी भाभी को छेड़ा।
"हाँ! आठ साल हो गए पर खानदान का वारिस अब तक न जन सकी।" सास ने मुँह बिचका दिया।
"माँ भी न, जब देखो भाभी को कोसती रहती हैं। सोचते हुए वह भाभी की और मुखातिब हुई। "भाभी मैं आपके कमरे में बैठ जाऊँ, मुझे 'अधिकारों की लड़ाई' पर लेख लिखना है।"
"सुन सुधा, सुन तो ! तू माँ के ....|" भाभी की बात अधूरी रह गयी थी और वह कमरे में जा पहुँची थी।
"भाभी यह क्या? आपका तकिया भीगा हुआ है। किसी बात पर लड़ाई हुई क्या भैया से !"
"वह रात थी सुधा, बीत गयी। सूरज के उजाले में तू क्यूँ पूरी काली रात देखना चाह रही है।"
"काली रात का तो पता नहीं भाभी परन्तु रात का स्याह अपनी छाप तकिये पर छोड़ गया है और इस स्याह में भोर सा उजास आप ही ला सकती हैं।" सुधा अनायास ही गंभीर हो गयी थी और इधर उसका लेख 'अधिकारों की लड़ाई' भाभी के दिमाग में सबक बन कौंध रहा था।
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"सबक" 16 October 2016 को इस ग्रुप में ...
https://www.facebook.com/groups/540785059367075/permalink/991128497666060/

https://kavitabhawana.blogspot.in/.../blog-post_17.html...
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५--*सभ्यता के दंश*

''मैं तहजीब़ के शहर लखनऊ से हूँ |" विवेक ने अपना परिचय देते हुए कहा |
"किस तहजीब की बात कर रहे है, जनाब?  तहजीब़ तो अब उस शहर में बेगैरत लोगों के घर में पानी भरती है |" उसकी बात के जवाब से शीला भड़क सी गई |

"रोज-रोज कोई न कोई खबर आपके इस तहजीब़ के शहर से आ ही जाती है | औरत तो मर कर भी नहीं मरती | बड़ी सख्त जान है यह औरत जात | अच्छा करते हैं वे माँ-बाप जो भ्रूण कन्या की हत्या कर देते हैं, वर्ना कमीने भूखे भेड़िये एक दिन ऐसा भी करेंगे कि पैदा होते ही बलात्कार करने की ताक में रहें |"
शीला का पति शैलेश चुप रहने को कह अपने दोस्त से बोला, ''यार, बुरा न मनना, ऐसी घटनाओं पर ये कुछ ज्यादा ही भावुक हो उठती है |"
"अरे नहीं नहीं", विवेक बोला, ''भाभी का गुस्सा जायज है| हम सच में न जाने किस मानसिकता के बशीभूत हो रहे हैं | पहले तो बस औरतों की बेकदरी करते थे पर अब तो आये दिन ऐसी घटनायें चुल्लू भर पानी में डूबने को विबश करती है |''
अपनी बात को जारी रखते हुए वह शीला की ओर मुखातिब हुआ, '' शर्मिंदा हैं भाभी, हम ! आपसे वादा है, कम से कम मैं अपनी जिन्दगी में कभी भी औरतों की बेइज्जती नहीं करूँगा और न ही अपने आस-पास किसी को करने दूँगा |''
"रोटी और लीजिये न भाईसाहब, संकोच मत कीजिए |" कुछ ही देर में सब खाने की मेज पर थे |
मुस्कराता हुआ विवेक सोच रहा था - यह वही भाभी है जो दो मिनट पहले चंडी-सी थी जो अब अन्नपूर्णा बन गयी है | 
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(सहोदरी में सभ्यता के दंश ऐसी छपी है, बाद में इसमें बदलाव करके ब्लॉग पर पोस्ट है)

Tuesday, 13 February 2018

९) "आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह -

"आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह - अयन प्रकाशन |
सम्पादक द्वय - सम्पादक द्वय .. ज्योत्स्ना 'कपिल' और डॉ. उपमा शर्मा |
विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१८ में हुआ |
"आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह जनवरी -२०१८ में प्रकाशित "परिवर्तन" नामक कथा-
जिसका विमोचन विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टॉल पर हुआ |
सम्पादक द्वय .. ज्योत्स्ना 'कपिल' और डॉ. उपमा शर्मा | नवांकुर सम्पादकों की एक कामयाब कोशिश |
 रामेश्वर काम्बोज भैया द्वारा हस्ताक्षरित ..आशीर्वाद है यह भी बड़ो का :) भैया को भी पसंद आई कथा जिसका जिक्र उन्होंने किताब के फ्लैप पर किया हैं | है न ख़ुशी की बात ..:)
 कमल चोपड़ा भैया द्वारा हमारी कथा परिवर्तन के विषय में उल्लेख ...अच्छा लगता है जब बड़े आशीर्वाद दें :)




"आसपास से गुज़रते हुए" साँझा-लघुकथा-संग्रह जनवरी -२०१८ में प्रकाशित "परिवर्तन" नामक कथा-

परिवर्तन -

मम्मी! "ऑन लाइन आर्डर कर दूँगा, या चलिए मॉल से दिला दूँगा | वह भी बहुत खूबसूरत- बढ़िया दीये। चलिए यहाँ से | इन गंवारो की भाषा समझ नहीं आती, ऊपर से रिरियाते हुए पीछे ही पड़ जाते हैं | बात करने की तमीज भी नहीं है इन लोगों में |"
मम्मी उस दूकान से आगे फुटपाथ पर बैठी एक बुढ़िया की ओर बढ़ी। उसके दीये खरीदने को, जमीन में बैठकर ही चुनने लगीं | 
देखते ही झुंझलाकर संदीप बोला- "क्या मम्मी, आप ने तो मेरी बेइज्जती करा दी, मैं 'हाईकोर्ट का जज' और मेरी माँ जमींन पर बैठी दीये खरीद रही है। जानती हो ! कैसे-कैसे बोल बोलेंगे लोग... 'जज साहब' ..."
बीच में ही माँ आहत होकर बोली - "इसी जमीन में बैठकर ही दस साल तक सब्जी बेची है मैंने। कई तेरी जैसों की मम्मियों ने ही ख़रीदा है मुझसे सब्जी, तब जाके आज तू बोल पा रहा है। वह दिन तू भले भूल गया बेटा, पर मैं कैसे भुलूँ भला | तेरे मॉल से या ऑनलाइन दीये तो मिल जायेंगे, पर दिल कैसे मिलेंगे भला?" 
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इस लिंक पर इसका बड़ा रूप भी ...माने थोड़ा विस्तार .
http://kavitabhawana.blogspot.in/2014/10/blog-post_18.html

८) 'सफ़र संवेदनाओं का' -साँझा-लघुकथा-संग्रह -

'अपने अपने क्षितिज' साँझा-लघुकथा-संग्रह -वनिका पब्लिकेशन
सम्पादक द्वय -डॉ. जितेन्द्र जीतू जी और डॉ. नीरज सुधांशु जी |
विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१७ में हुआ |
प्रकाशित चार लघुकथाएँ .
१..ज़िद नहीं
2...हिम्मत
३...सुरक्षा घेरा
4..दर्द |
--००--लघुकथा विषय में महत्वपूर्ण बात ..


२०१८ में प्रकाशित चार लघुकथाएँ-
१..पछतावा
२ -परिपाटी
३--उपाय
४--अमानत
---००----


-तोहफ़ा के साथ यही चारों कथाएँ लघुकथा.कॉम वेबसाइट के संचयन में संचित हैं ....इस लिंक पर ..
-तोहफ़ा.
.पछतावा
-परिपाटी
--उपाय
--अमानत
http://laghukatha.com/%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%95…/

१..पछतावा
"बाबा आप अकेले यहाँ क्यों बैठे हैं? चलिए आपको आपके घर छोड़ दूँ |"
बुजुर्ग बोले, "बेटा जुग जुग जियो। तुम्हारे माँ -बाप का समय बड़ा अच्छा जायेगा | और तुम्हारा समय तो बहुत ही सुखमय होगा |"
"आप ज्योतिषी हैं क्या बाबा ?"
हँसते हुये बाबा बोले - "समय ज्योतिषी बना देता है। गैरों के लिए जो इतनी चिंता रखे, वह संस्कारी व्यक्ति दुखित कभी नही होता | " आशीष में दोनों हाथ उठ गये उनके फिर से |
"मतलब बाबा ? मैं समझा नहीं | "
"मतलब बेटा मेरा समय आ गया | अपने माँ बाप के समय में मैं समझा नहीं कि मेरा भी एक-न -एक दिन तो यही समय आएगा | समझा होता तो ये समय नहीं आता |" नजरे धरती पर गड़ा दीं कहकर |
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पछतावा इस लिंक पर भी ....
http://kavitabhawana.blogspot.in/2015/05/blog-post.html


 २ -परिपाटी-

अपनी बहन की शादी में खींची गई उस अनजान लड़की की तस्वीर को नीलेश जब भी निहारता, तो सारा दृश्य आँखों के सामने यूँ आ खड़ा होता, जैसे दो साल पहले की नहीं, कुछ पल पहले की ही बात हो।
वह भयभीत-सी इधर-उधर देखती फिर सबकी नजर बचाकर चूड़ियों पर उँगलियाँ फेरकर खनका देती। चूड़ियों की खनक सुनकर बच्चियों-सी मुस्कुराती फिर फौरन सहम कर गम्भीरता ओढ़ लेती। सोचते-सोचते नीलेश मुस्कुरा दिया।
वहीं से गुजरती भाभी ने उसे यूँ एकान्त में मुस्कराते देखा तो पीछे पड़ गईं, ‘‘किसकी तस्वीर है? कौन है यह?’’ उनके लाख कुरेदने पर नीलेश शर्माते हुए इतना ही बोल पाया, ‘‘भाभी हो सके तो इसे खोज लाओ बस, एहसान होगा आपका!’’
फिर क्या था! भाभी ने लड़की की तस्वीर ले ली और उसे ढूँढ़ना अपना सबसे अहम टारगेट बना लिया। आज जैसे ही नीलेश घर वापस आया, भाभी ने उस लड़की की तस्वीर उसे वापस थमा दी, और उससे आँखें चुराती हुई बुदबुदाईं, “भूल जा इसे। इस खिलखिलाते चेहरे के पीछे सदा उदासी बिखरी रहती है, नीलेश!’’
‘‘क्या हुआ भाभी, ऐसा क्यों कह रहीं हैं आप!!’’ मुकेश ने पूछा तो आसपास घर के अन्य सदस्य भी आ गए।
‘‘यह लड़की मेरे बुआ के गाँव की है। उसकी शादी हो चुकी है, पर अफसोस उसका पति सियाचिन बॉर्डर पर शहीद हो चुका है।’’ भाभी ने बताया। सबने देखा कि नीलेश भाभी के आगे हाथ जोड़कर,गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘भाभी इस लड़की के साथ मैं अपनी मुस्कुराहट साझा करना चाहता हूँ। प्लीज कुछ करिए आप!’’
नीलेश की यह बात सुनते ही परिजन सकते में आ गए।
‘‘मेरी सात पुश्तों में किसी ने विधवा से शादी करने का सोचा तक नहीं, फिर भले वह विधुर ही क्यों न रहा हो! तू तो अभी कुँवारा ही है! अबे! तू विधवा को घर लाएगा….? कुल की परिपाटी तोड़ेगा……,नालायक?’’ पिता जी फौरन कड़कते हुए नीलेश को मारने दौड़े। बीच-बचाव में माँ, पिता को शान्त कराने के चककर में अपना सिर पकड़कर फर्श पर ही बैठ गईं।
पिता जी अभी शान्त भी न हुए थे कि अब बड़ा भाई शुरू हो गया, ‘‘अरे छोटे! तेरे लिए छोकरियों की लाइन लगा दूँगा। इसे तो तू भूल ही जा।’’
विरोध के चौतरफा बवंडर के बावजूद नीलेश अडिग रहा। उसने रंगबिरंगी चूड़ियों में समाई उस लड़की की मुस्कान वापस लौटाने की जो ठान ली थी। इस हो-हल्ले में माँ ने जब अपने दुलारे नीलेश को अकेला पड़ता पाया ,तो उन्होंने नीलेश की कलाई पकड़ी ओैर अपने कमरे की तरफ उसे साथ में लेकर बढ़ चलीं ओर धीमी आवाज में बोलीं, ‘‘रंगबिरंगी नहीं, मूरख! लाल-लाल चूड़ियाँ लेना! हमारे यहाँ सुहागनें लाल चूड़ियाँ ही पहनती हैं। कुल की परिपाटी तोड़ेगा क्या नालायक!’’
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३--उपाय-
माँ मना करती रही कि घर में कैक्टस नहीं लगाया जाता। किन्तु सुशील बात कब सुनता माँ की। न जाने कितने जतन से दुर्लभ प्रजाति के कैक्टस के पौधे लगाए थे। आज अचानक उसे बरामदे में लगे कैक्टस को काटते देख रामलाल बोले, ‘‘अब क्यों काटकर फेंक रहा है? तू तो कहता था कि इन कैक्टस में सुंदर फूल उगते हैं? वो खूबसूरत फूल मैं भी देखना चाहता था।’’
‘‘हाँ बाबूजी, कहता था, पर फूल आने में समय लगता है, परन्तु काँटे साथ-साथ ही रहते। आज नष्ट कर दूँगा इनको!’’
‘‘मगर क्यों बेटा?’’
‘‘क्योंकि बाबूजी, आपके पोते को इन कैक्टस के काँटों से चोट पहुँची है।’’
‘‘ओह, तब तो समाप्त ही कर दो ! पर बेटा इसने अंदर तक जड़ पकड़ ली है! ऊपर से काटने से कोई फायदा नहीं!’’
‘‘तो फिर क्या करूँ?’’
‘‘इसके लिए पूरी की पूरी मिट्टी बदलनी पड़ेगी। और तो और ,इन्हें जहाँ कहीं भी फेंकोगे ये वहीं जड़ें जमा लेंगे।’
‘‘मतलब इनसे छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं?’’
‘‘है क्यों नहीं…..’’ कहकर कहीं खो से गए।
‘‘बताइए बाबूजी, चुप क्यों हो गए?’’
‘‘तू अपनी दस बारह साल पीछे की ज़िन्दगी याद कर!’’
माँ के मन में उसने न जाने कितनी बार काँटे चुभोए थे। अपनी जवानी के दिनों की बेहूदी हरकतों को यादकर शर्मिंदा हुआ। माँ भी तो शायद चाहती थी कि ये काँटे उसके बच्चों को न चुभें।
‘‘मैंने तुझे संस्कार की धूप में तपाया, तू इन्हें सूरज की तेज़ धूप में तपा दे।’’ उसकी ओर गर्व से देख पिता मुस्कुराकर बोले।
फिर वह तेजी से कैक्टस की जड़ें खोदने लगा।
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इसी "पैंतरा"कथा का बदला हुआ स्वरूप है "उपाय" कथा ..सही करते करते रूप रंग बदल गया ..
४-- अमानत-

माँ को मरे पाँच साल हो गए थे। उनकी पेटी खोली ,तो उसमें गहनों की भरमार थी। पापा एक-एक गहने को उठाकर उसके पीछे की कहानी बताते जा रहे थे।
जंजीर उठाकर पापा हँसते हुए बोले, ‘‘तुम्हारी माँ ने मेरे से छुपाकर यह जंजीर पड़ोसी के साथ जाकर बनवाई थी’’
‘‘आपसे चोरी !पर इतना रुपया कहाँ से आया था?’’
‘‘तब इतना महँगा सोना कहाँ था! एक हज़ार रुपए तोला मिलता था। मेरी जेब से रुपए निकालकर इकट्ठा करती रहती थी तेरी माँ। उसे लगता था कि मुझे इसका पता नहीं चलता;किन्तु उसकी खुशी के लिए मैं अनजान बना रहता था। बहुत छुपाई थी यह जंजीर मुझसे, पर कोई चीज छुपी रह सकती है क्या भला!’’
तभी श्रुति की नज़र बड़े से झुमके पर गई, ‘‘पापा,मम्मी इतना बड़ा झुमका पहनती थीं क्या?’’ आश्चर्य से झुमके को हथेलियों के बीच लेकर बोली।
‘‘ये झुमका! ये तो सोने का नहीं लग रहा। तेरी माँ नकली चीज़ तो पसन्द ही नहीं करती थी, फिर ये कैसे इस बॉक्स में सोने के गहनों के बीच रखी है।’’
‘‘इसके पीलेपन की चमक तो सोने जैसी ही लग रही है, पापा!’’
‘‘कभी पहने तो उसे मैंने नहीं देखा। और वह इतल-पीतल खरीदती नहीं थी कभी।’
तभी भाई ने, ‘‘पापा, लाइए सुनार को दिखा दूँगा’’ कहकर झुमका हाथ में ले लिया।
बड़े भाई की नज़र गई ,तो वह बोला, ‘‘हाँ लाइए पापा, कल जा रहा हूँ ,सुनार के यहाँ, दिखा लाऊँगा।’’
दोनों भाइयों के हाथों में झुमके का जोड़ा अलग-अलग होकर अपनी चमक खो चुका था। दोनों बेटों की नज़र को भाँपने में पिता को देर नहीं लगी।
बिटिया के हाथ में सारे गहने देते हुए पिता ने झट से कहा, ‘‘बिटिया,बन्द कर दे माँ की अमानत वरना बिखर जाएगी।’’
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अमानत इस लिंक पर
http://kavitabhawana.blogspot.in/2017/01/blog-post_57.html


७) "नई सदी की धमक" साँझा-लघुकथा-संग्रह -

"नई सदी की धमक" साँझा-लघुकथा-संग्रह -दिशा प्रकाशन 
सम्पादक - श्री मधुदीप गुप्ता 
विमोचन- दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जनवरी २०१८ को हुआ |
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"नई सदी की धमक" साँझा संग्रह प्रभाकर भैया और मधुदीप अंकल के आशीर्वाद के साथ प्राप्त कर ली हमने | पड़ताल के दो खंड खरीदने पर धमक फ्री, जिसके स्पांसर प्रभाकर भैया थे | इसलिए इस किताब पर उनका आशीर्वाद बहुत जरूरी था ...हैं न !!


मूल्य - (धमक में छपी -बेटी नाम से )


छुट्टी की बड़ी समस्या है दीदी, पापा अस्पताल में नर्सो के सहारे हैं ! भाई से फोनवार्ता होते ही सुमी तुरन्त अटैची तैयार कर बनारस से दिल्ली चल दी |
अस्पताल पहुँचते ही देखा कि पापा बेहोशी के हालत में बड़बड़ा रहें थे| उसने झट से उनका हाथ अपने हाथों में लेकर, अहसास दिला दिया कि कोई है, उनका अपना |
हाथ का स्पर्श पाकर जैसे उनके मृतप्राय शरीर में जान सी आ गयी हो |

वार्तालाप घर-परिवार से शुरू हो न जाने कब जीवन बिताने के मुद्दे पर आकर अटक गयी |
एक अनुभवी स्वर प्रश्न बन उभरा, तो दूसरा अनुभवी स्वर उत्तर बन बोल उठा -"पापा पहला पड़ाव आपके अनुभवी हाथ को पकड़ के बीत गया | दूसरा पति के ताकतवर हाथों को पकड़ बीता और तीसरा बेटों के मजबूत हाथों में आकर बीत गया |"
"चौथा ..., वह कैसे बीतेगा, कुछ सोचा? वही तो बीतना कठिन होता बिटिया |"
"चौथा आपकी तरह !"
"मेरी तरह! ऐसे बीमार, नि:सहाय !"

"नहीं पापा, आपकी तरह अपनी बिटिया के शक्तिशाली हाथों को पकड़, मैं भी चौथा पड़ाव पार कर लूँगी |"
"मेरा शक्तिशाली हाथ तो मेरे पास है, पर तेरा किधर है?" मुस्करा कर बोले |

"नानाजी" तभी अंशु का ऊँचा स्वर कानों में घंटी सा बज, पूरे कमरे में गूँज उठा | समवत दो और स्वर गूँजे ! आवाज़ पहचानकर, भावातिरेक में सुमी उठी तो लड़खड़ा गयी | दोनों बेटे आगे बढ़कर दोनों हाथ पकड़, उसे सम्भाल लिए |
यह देखकर सुमी के पिता गर्व से बोले -"संस्कारित जमीन में चंदन ही महकेगा, कँटीला बबूल थोड़ी।"

(नई सदी की धमक में अंत बदला हुआ है) कुछ इस तरह ..
"नानाजी" तभी अंशु का सुरीला स्वर उनके कानों में बजकर पूरे कमरे में को संगीतमय कर गया |


(समवत दो और स्वर गूँजे ! आवाज़ पहचानकर, भावातिरेक में सुमी उठी तो लड़खड़ा गयी | दोनों बेटे आगे बढ़कर दोनों हाथ पकड़, उसे सम्भाल लिए |
यह देखकर सुमी के पिता गर्व से बोले -"संस्कारित जमीन में चंदन ही महकेगा, कँटीला बबूल थोड़ी।") ....
धमक में यह पार्ट काट दिया गया |

इस कथा की समीक्षा उमेश महादोषी भैया द्वारा हुई है ..आभार आपका भैया जी ..:)--

"नई सदी की धमक" साँझा संग्रह में प्रकाशित "मूल्य - (धमक में -बेटी)" नामक लघुकथा को अपने सम्पादन में स्थान देने के लिए मधुदीप अंकल जी का दिल से आभार ..अंकल जी के साथ हम पुस्तक मेले में जनवरी २०१८ |


21/10/2016-ओबीओ में लिखी थी हमने यह लघुकथा ..:)  
http://openbooks.ning.com/.../blogs/5170231:BlogPost:809199

इसी ब्लॉग के निचे दिए गये इस लिंक पर भी ...
http://kavitabhawana.blogspot.in/2016/12/blog-post.html

६) "आधुनिक हिंदी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ" साँझा-लघुकथा-संग्रह

"आधुनिक हिंदी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ" साँझा-लघुकथा-संग्रह--बोधि प्रकाशन |
सम्पादक- कीर्ति शर्मा 
विमोचन- अजमेर में अक्टूबर 2017 को |
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२०१७ में पुरस्कृत "सर्वधाम" नामक कथा प्रकाशित -

अच्छा लगता है, सपना जो कभी देखा ही नहीं, लेकिन वहीं फलित होने पर बड़ा सच्चा लगता है। बहुत बहुत शुक्रिया डॉ. अखिलेश पालरिया जी आपका।

यह हमारी अपनी कामयाबी की सीढ़ी का पहला पायदान भी कहा जा सकता है । 😊😊😊😊
सभी प्रकाशित लोगों को हार्दिक बधाई भी हमारी ओर से।  #शब्द निष्ठा #सम्मान😊😊😊😊👍


'शब्द निष्ठा सम्मान 2017' श्री अखिलेश पालरिया  द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में आयी 
170 लघुकथाकारों की 850 कथाओं में से 110 चुनी गई कथाओं के बीच हमारी अपनी भी ३५वें नम्बर पर 
"सर्वधाम" नामक लघुकथा को प्राप्त हुआ शब्दनिष्ठा सम्मान-2017।

शुक्रिया सभी जजों का । 




बुरा नहीं रहा फेसबुक का सफ़र। कुछ खरोंचे जरूर आयी कांटो की वजह से, तो खुशियां भी अपार मिली।
--००--

सर्वधाम -


"क्या चल रहा आजकल ?" फोन उठाते ही जेठानी पूछीं |

"अरे कुछ नहीं दीदी, घर अस्तव्यस्त है न | परसो से उसे ही समेटने में लगी हूँ | बच्चों सहित इनके साथ चारोधाम यात्रा करने चली गयी थी न |"
"अच्छा ! चारोधाम कर आयी और हमें भनक भी न लगने दी |" तुनकते हुए बोलीं |
"नहीं दीदी ऐसी बात नहीं है !"
"ऐसी नहीं, तो फिर कैसी बात है? वैसे तो तुम कहती हो, दीदी! हर बात बताती हूँ मैं आपको | फिर इतनी बड़ी बात कैसे छुपा ली मुझसे ! डर था क्या कि हम सब भी साथ हो लेंगे | साथ नहीं चाहती थी तो साफ़ साफ़ मना कर देती, छुपाया क्यों ?"
"अरे दीदी सुनिए तो ...|"
"क्या सुनू सुमन | मैं तो सब बात बताती हूँ, पर तुम छुपा जाती हो | हर बार जब साथ साथ कहीं भी जाते हैं, तो आधा खर्चा हम भी देते हैं न | माना हम पांच और तू चार है ..| एक बच्चे का खर्चा सहने में तकलीफ़ थी तो बता देती | आगे से कहीं भी जायेंगे, तो हम ज्यादा रूपये दे देंगे, समझी ! किसी का ऐहसान हम नहीं लेते |"

"अरे नहीं दीदी ! सुनिए तो ..|" फोन कट |
थोड़ी देर में सुमन फिर फ़ोन मिलाकर बोली -"दीदी गुस्सा ठंडा हुआ हो तो सुनिए ! आपसे पूछा था मैंने |"
"कब पूछा तुमने |" गुस्से में बोलीं जेठानी |
"महीने भर पहले ही जब बात हुई थी, तभी मैंने आपसे पूछा था कि आप अम्मा-बाबू जी के पास, इस गर्मी की छुट्टी में गाँव चलेंगी !"
अब दूसरी तरफ शांती फ़ैल गई थी |
=======(शब्द निष्ठा सम्मान-२०१७ में ३५ वें नम्बर पर सम्मानित) ====

यहाँ  इस ग्रुप में लिखी  थी इसे .
29 February 2016 में ...
https://www.facebook.com/events/979124858844337/permalink/982249925198497/?ref=1&action_history=null




इसी ब्लाग के इस लिंक पर भी ...

आचार्य रत्नलाल 'विद्यानुग' स्मृति अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता के अन्तर्गत 'शब्द निष्ठा सम्मान-2017' में मेरी लघुकथा 'सर्वधाम' ३५वें स्थान पर रही |

"पानी" (संस्मरण) १८/७/२०१७ को सांझा रूप "यादों के दरीचे" नामक संग्रह में संग्रहित


 सम्मान पत्र जो पटना में मिलना था | अफ़सोस हम नहीं जा पाए | घर बैठे ह्वाट्सएप कि मेहरबानी से सम्मानपत्र की तस्वीर साझा कर रहें हैं .:)

 लीजिए बंधुओं हमारी इस छोटी सी खुशी में शामिल हों लीजिए।
आता जाता कुछ नहीं पर टांग हर जगह अड़ा देतें हैं हम। अपना पहला एक संस्मरण भी अब सांझा रूप "यादों के दरीचे" नामक संग्रह में आ गया है। सम्पादक द्वय का आभार ..:)

"पानी" (संस्मरण)
बात उन दिनों की है जब मैं क्लास 9th में थी। हर स्कूल की तरह मेरे स्कूल में भी पानी-बाथरूम की समस्या थी ही। बाथरूम की बदबू तो नाक बंद करके बर्दास्त्त की जा सकती थी | अतः बिना किसी शोर शराबे के छात्रायें आँख बंद करके किसी तरह सहन कर लेती थीं। सहन करना मजबूरी भी थी। किन्तु पानी की कमी असहनीय हो जाती थी |
मेरे स्कूल में पानी की व्यवस्था तो एक अनार सौ बीमार जैसी कहावत को भी मात देती रही थी | ऐसी डामाडोल व्यवस्था तो किसी सरकारी आयोजन में भी नहीं हुआ करती है।
लगभग 7×4 फुट लम्बाई की एक ही टँकी थी। और छात्राएं 12 सौ के करीब। पानी जब तब खत्म हो जाता था। 'एक तो तीत लौकी ऊपर से नीम चढ़ी' उसमें गिनती के चार नल बने होने के कारण भी गाहे बगाहे बहुत परेशानी होती थी।
तब के जमाने में आज की तरह घर से बोतल लेकर स्कूल जाना आम बात नहीं थी । मजबूरी में ही एक दो छात्रा ही कभी-कभी बोतल लेकर आती थीं। वो भी तब जब परेशानी ज्यादा होने लगती थी।
एक दिन खाने की छुट्टी हुई और छुट्टी के होते ही टँकी के पास छात्राओं की भीड़ टूट पड़ी। उस भीड़ में मैं पानी पीने नहीं गयी। भीड़ से मुझे शुरू से ही एलर्जी सी थी, जब तक भीड़ कम होती, टँकी का पानी खत्म हो चुका था।
अब सब परेशान! क्योंकि कई छात्रायें अभी भी पानी नहीं पी थीं।
हो-हल्ला सुनकर अलग से पानी की व्यवस्था कर दी जाती थी। जब भी ऐसा होता तो चर्चा होती कि इस समस्या की शिकायत प्रिंसिपल से की जाये। पर बिल्ली के गले में घण्टी बांधे कौन। कोई टीचर्स से भी बोलने को तैयार नहीं होता था। प्रिंसिपल से बोलना तो बड़ी दूर की बात थी।
उस दिन भी यही समस्या आयी। पानी खत्म, और टँकी से मतलब भीड़ से दूरी बनाये खड़ी रही मैं। लेकिन क्रोध बड़े नजदीक आ गया था बल्कि कहिये मेरे नस-नस में समाने लगा था।
हमारी प्यास जैसे-जैसे बढ़ रही थी क्रोध सातवें आसमान पर चढ़ रहा था। फिर क्या था धड़धढाते पहुँच गए मुँह उठा कर टीचर्स रूम में।
टीचर्स रूम में जाकर क्या-क्या बोले कुछ ज्यादा याद नहीं, बस इतना याद है या कहिये यादास्त पर जोर डालने पर याद आ रहा कि बोले थे कि आप लोग तो अपने पानी की व्यवस्था अलग रखती हैं, बच्चों की कोई फ़िक्र ही नहीं है आप लोगों को।
सब दिदिया (टीचर्स ) देखती रही थी मेरा मुँह। उन्हें शायद विश्ववास नहीं था कि कोई छात्रा ऐसे आकर बोल भी सकती है। बोल-बाल कर तीर से भी तेजी से उस रूम से बाहर निकलकर तेज़ कदमों से आगे कक्षा की ओर बढ़ गए।
पीछे से मेरी होमसाइंस की दीदी ने पुकारा। पीछे मुड़कर मैंने देखा तो वो जग में पानी लिए खड़ी थीं। फिर मैं पास गई और पानी पीकर भी उसी गुस्से से बिना धन्यवाद दिए वहां से चल दी । फिर क्या था पानी पीने वालो की लाइन लग गयी थी।
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सविता मिश्रा 'अक्षजा'