Friday, 30 November 2012

++माँ तो आखिर माँ होती है ++





नौ महीने तक हम तुझे,
कोख में छुपा के चले ,
दो वर्ष तक तो हम तुझे ,
गोद में उठा के चले ,
डेढ़ से दो वर्ष तो हम तेरी ,
हर अनकही को भी समझे|

फिर तेरी माँ की बस,
बोली सुन के हर्षे |
तेरे पहले कदम पर भी ,
हम ही बच्चे बन के उछले,
तेरे भूख प्यास कों भी समझे,
तेरे हर चाल ढाल कों समझे ,
तेरे हर प्रयत्न को शाबासी हम दिये,
सीख जायें तू तब तक उत्साहित तुझे किये|

पढ़ना लिखना तुझे सिखायें ,
चलना सही डगर बतायें ,
डगमगायें ना कही तू ,
हम हर समय सहारा बन तेरा रहे ,
और आज तू जब बड़ा हो गया ,
हमें ही तू अपना बोझ कह गया |

बुढ़ापा जब हमारा लगा आने,
तब एक भी दिन हम
तुझे लगे भारी लगने ,
पिछला सब कुछ भूल तुने ,
लगा अब तो दूसरों की है सुनने,
माँ तुझे अब लगी है खलने ,
हम से ही चला अपना पिंड छुड़ाने ,

छोड़ आया तू हमें ही वीराने,
माँ कहने में भी अब लगी तुझे शर्म आने |

फिर भी मैं तो माँ हूँ तेरी ,
तुझे लग जायें यह दुआ मेरी ,
तेरे बच्चे ना करे यह गत तेरी ,
पलकों पर रखे आदर करे सदा तेरी ||

|| सविता मिश्रा ||

Monday, 26 November 2012

एक या दो नहीं तीन ..:)

१.....सहनशक्ति
============
हमारी सहनशक्ति को देखना चाहता था
दुःख पर दुःख दे वह परीक्षा ले रहा था
हम भी थे खड़े अडिग हो माथे शिकन ना था
तमतमाया बहुत थक हार चलता बना ..|| सविता मिश्रा ||

२....
नाम की इज्जत
============
भस्मीभूत हो जायेगा एक दिन
यह निरीह शारीर मेरा
नहीं चाहती करे कोई बखान
पर इज्जत से नाम ले मेरा |सविता मिश्रा


३...ठगी
========
जी रहे थे मौत के इंतजार में
मौत आयी पर धोखा दे गयी
उठा लिया किसी और को छोड़ हमें
जिन्दगी छोड़ो मौत से भी मैं ठगी गयी |
|| सविता मिश्रा ||
ji rahe the mout ke itajaar me
mout aayi par dhokha de gayi
utha liya kisi our ko chhod hame
jindagi chhodo mout se bhi mai thagi gayi|
+++savita mishra+++

Saturday, 24 November 2012

मन की

१..उपाय
-----------

ओंठो को सिल लिया है अब हमने
कि कहीं राज जख्मों का खोल ना दूँ
आँखो को अब कर लिया है सुनी हमने
कि कहीं गम के समुन्दर का ना दीदार हो
ठूंस ली हैं रुई अब हमने कानों में
कि कहीं किसी के व्यंग से ना आहत और हो
चेहरे पर अब हमने डाल दिए हैं परदे
कि कहीं सुरत से अपनी दर्द को न जाहिर कर दूँ |
++सविता मिश्रा ++
कटु शब्द
======
स्नेह से लबरेज समझ कर आये थे
आपने ही कटु शब्द कह लौटा दिया
अपना समझ कर आये थे दर पे तेरे
बेगाना समझ तुने हमे भगा दिया ..सविता

Tuesday, 20 November 2012

==जमाना ठगा देखता रहा==

जमाना ठगा देखता रहा,
और हम धूँ-धूँ कर जल उठे|
आग के लपटों से घिरी,
उप्पर से लोहे कि तपिश |
अपने ही कपड़ो में सिकुड़े ,
हम धूँ-धूँ कर जल उठे |

हो गयी गोधरा की पुनरावृत्ति,
फर्क बस इतना सा रहा,
वहाँ गद्दारों ने नफ़रत की चिता सजाई ,
परन्तु यहाँ अपनो ने ही की लापरवाही|
हुआ जो हादसा कि
इंसानियत उठी चीत्कार
और हम !
हम तो धूँ-धूँ कर जल उठे |

चिता पर हमारी न जाने कितनों की,
सिंक गयी रोटियाँ ...
कहीं खुली रेल की पोल,
तो कहीं रेल मंत्रालय की|
राजनितिक पार्टिया तो
हो गयी बल्ले-बल्ले |
एक दूसरे की सभी
टांग खिंचते रह गये|
हमारी फिक्र किसी को कहाँ
हम तो !
हम तो धूँ-धूँ कर जल उठे |

समाचार-एजेंसिया समाचार,
पहले बताने की होड़ में लगी |
कवि कविता बनाने चल पड़े,
राजनीतिज्ञ कुर्सी डिगाने पिल पड़े |
हमारी है किसे खबर
हम तो !
हम तो धूँ-धूँ कर जल उठे |

चिता सजती है लकड़ी की
हमारी तो लोह सैया सज गयी |
सोये थे लेकर मीठे-मीठे सपने ,
खुली आखँ तो,
अपनी ही जलती चिता मिली|
दुनिया ठगी देखती रह गयी
और हम !
हम धूँ-धूँ कर जल उठे |

कितनों ने की बचने की हाथा-पाई,
कर करुण-क्रंदन भगवान बुलायें |
परन्तु भगवान भी ना आ सका,
हम तुच्छ प्राणी जल गये|
दुनिया ठगी देखती रही
और हम !
हम तो धूँ-धूँ कर जल उठे |
+++सविता मिश्रा +++16/5/2003

Monday, 19 November 2012

स्वकथन

     १...पत्थर को भगवान् बनाने वाला इंसान होता है, पर इंसान खुद को इंसान बना पाने में असफल रहता है ..क्योकि पत्थर को तराशना आसान है, खुद को मुश्किल..सविता मिश्रा
२...औरत के पास ताकत है पर वह उसका इस्तेमाल सहने में करती है, जिस दिन भड़क गयी हिम्मत नहीं किसी पुरुष में ..मरेगी तो अवश्य पर मार कर एक दो को....सविता


३ ....कौन क्या पहनता है क्या खाता है क्या पिता है क्या मतलब है पर नहीं दूसरों के गिरेबान में झांकने की बुरी आदत जो है कैसे सुधरें .....सच्चाई भी हजम नहीं होती लोगों को बस बैल की तरह सिंग उठाई और मारने लगे बिना समझे बिना बुझे ........वैसे आवारा पशुओं की तादाद बढती जा रही है ..है ना ..उपाय तो है पर कारगर शायद नहीं ...सविता ...
असभ्य लोग कृपया दुरी बनाएं रक्खे इस पोस्ट से ........शुभ संध्या आप सभी को

कुछ यूँ ही

१....माना हम सूरज है पर चाहत नहीं उसकी तरह ख्याति पायें
दीपक बन भी यदि रोशन कर सकें जहाँ तो खुशनसीबी होगी अपनी
...सविता
२...सूरज से आंख मिलाने की धृष्टता कर बैठे थे कभी
उसने छट से हमे हमारी औकात दिखा दी थी तभी ..सविता मिश्रा


३..हमारी हर लेखनी पर क्यों बवाल कर देते हो
खामख्वाह हम पर ही क्यों सवाल कर देते हो ...सविता मिश्रा

४..
मुठ्ठी कस कर भींच रक्खी थी हमने गुमान था रिश्तों को बांध रखा हैं
पर रिश्तें एक-एक कर फिसलते गये रेत से मुट्ठी को लहुलुहान करके| सविता

५...
हम चुप है तो मत समझो तुम हमें कमजोर
चंडी बन गएँ तो बनना होगा तुम्हें रणछोर ....सविता

रेगिस्तान में नखलिस्तान ही ////मजबूर न थे


१...क्या बना भेजा था
प्रभु ने इह लोक

हम क्या बनते जा रहे है
किकर्व्यविमुढ हो
इधर उधर भटकते

रेगिस्तान में नखलिस्तान ही
ढूढ़ते खुद को पा रहे है
...
..
. सविता

२....हम तो हम थे
पर अब जो तुम हो
वह पहले तुम ना थे
कैसे समझाए
हम खुद को
पहले कभी इतने
मजबूर न थे|सविता मिश्रा

~ फरेब को हकीकत समझते आ रहे है ~

जीना था जिए जा रहे थे
ना कोई उद्देश्य ना कोई चाहत थी

लोगों की भीड़ चलती
जिधर
चल पड़ते हम भी उधर ही

थे
उद्देश्य हीन
करना
क्या था
क्या किये जा रहे थे|

मौत भी दस्तक दे लौट गयी
कई बार दरवाजे से हमारे

पीना था जहर
पिये जा रहे थे
लोगों के ताने
सहे जा रहे थे|

ख्वाब में ही
यह बदरंग दुनिया
 
बड़ी सुहानी सी लगती है 

हकीकत में तो जुल्मों सितम से
भरपूर डरावनी लगती है|

हर शख्स बेगाना सा लगता है
पर फिर भी अपना कह

खुद को ही धोखा दिए जा रहे है|
धोखे में ही जीने की आदत हो गयी है
अब तो
हर हकीकत को फरेब और
फरेब को हकीकत समझते आ रहे है |..
.सविता मिश्रा

### मिल ही जाता है###

जीना है तो .....
जीने का बहाना
मिल ही जाता है,
डूबते हुए को....
तिनके का सहारा
मिल ही जाता है,
अकेले रहना चाहो तो...
भीड़ में भी अकेले
रहने का ठिकाना
मिल ही जाता है,
ढूढ़ना चाहो तो...
 बेगानों में भी
कोई अपना सा
मिल ही जाता है,
दिल में भक्ति हो तो...
पत्थर में भी भगवान
मिल ही जाता है,
पाना चाहो तो ....
माँ-बाप में ही
चारो धाम
मिल ही जाता है,
विद्वता दिखाना चाहो तो...
मूर्खो का कारंवा
अपने ही आस-पास
मिल ही जाता है,
मिलना हो तो...
 गुदड़ी में भी “लाल”
मिल ही जाता है,
किस्मत अच्छी हो तो ....
वीरानों में भी
कोई गड़ा खजाना
 मिल ही जाता है,
पारखी नजर हो तो....
 कंकड़-पत्थर में भी
“कोहिनूर” हीरा
मिल ही जाता है,
ज्ञान पाने की
 अभिलाषा हो तो....
ज्ञानी क्या
मूर्खो से भी ज्ञान
मिल ही जाता है,
मौत लिखी है यदि
किस्मत में हमारी तो ....
उसे भी
कोई ना कोई बहाना
मिल ही जाता है||..
.सविता मिश्रा


Monday, 12 November 2012

&हूनर की कीमत&


इन झुग्गी झोपड़ी की जगह काश हम इनके लिए //////
एक कमरे का ही सही घर बना पाते///////
काश इन बेसहारों के जीवन में सहारा बन पातें/////
यूँ ही मुस्करातें हुए चेहरे को //////
अपने कैमरे में उतार पातें पर अफ़सोस/////////
यह तो कुछ पल की हंसी थी जो हमें /////
अपने सामने पा चेहरे पर जगी थी////////
वरना अँधेरे में तो जीने की आदत है इन्हें /////
छोटी छोटी खुशियों में ख़ुशी ढूढ़ ही लेते है //////
हूनर बाज है अपना हुनर बेचते है////
पर हुनर का खरीदार कहा है यहाँ///////
सड़को पर हुनर बेचने वाला तो/////
दो जून की रोटी को भी तरसता है//////
और शोरूमों में हुनर अनमोल हो बिकता है //////


हुनर की कीमत यदि इनकी भी लगने लगे /////
तो हम इन्हें दया दृष्टि से नहीं /////////
बल्कि ये हमें देखते नजर आयेगें//////
और एक कमरे का घर छोड़िये  /////
 महलों में हम इन्हें पायेगें ..
.सविता मिश्रा

Saturday, 10 November 2012

# कंधे का सुकून #


तू कभी मेरे कंधे पर
सर रखा करता था,
आज हमें तेरे
कंधे की जरुरत पड़ी है।

नारी भी क्या अज़ब किरदार है
उसे कंधे की जरुरत पड़ती ही है,
इसलिए नहीं कि वह कमजोर है
बल्कि इस लिए कि
उसमें प्यार का भण्डार है
कितने भी कंधो पर सर रखे
परन्तु प्यार है कि
ख़त्म होता ही नहीं
बल्कि बढ़कर
दूना चौगुना हो जाता है।

कभी पिता के कंधे पर सर रख हुई बड़ी
पिता से अभूतपूर्व लगाव हुआ
फिर पति के कंधे पर सर रख जवानी बिताई
जीवन भर साथ निभाने की कसम खाई
अब बुढ़ापे में बेटे के कंधे पर
सर रख सुकून पाई
जिसको अपने कंधे का
देकर सहारा
खुद ही इस लायक बनाई |...सविता मिश्रा

Tuesday, 6 November 2012

शब्द बाण

   १..    शब्दों के तीर================

शब्दों के तीर बड़े जालिम होते है
दिल में जा सीधे घाव करते है
नश्तर से चुभे शब्द बाण तुम्हारे
क्या करें हम अब भूले न भुलाये....सविता मिश्रा

२...व्यंग बाण
========

जिगर के  टुकड़े चार करें
आँसूओं  की भी भरमार करें

भरता नहीं
फिर भी उसका जिया
व्यंग बाण कर वह फिर प्रहार करें | ..
सविता मिश्रा



३...कुटिल चाल
===========
क्यों ऐसा है प्यार भरा रिश्ता भी मकड़जाल में फंस जाता
शब्दों के कुटिल चाल से
दिल को बहुत ही आघात हो जाता |...सविता

@आंसू @

दिखावटी अश्रु
============

जो मेरे मरने का
इंतज़ार किये बैठे हैं
देखना
दिल उनका
भले ही खुश हो
आँखों में आंसू ही होंगे,
मेरे मरने का
गम किसे है
ये जालिम जमाना
यह तो महज दिखावटी
अश्रु ही होंगे
बस |
++सविता मिश्रा ++
२..गम के आंसू
==========
फूल चुन-चुन हमने भी बिछायें थे
गम के आंसुओ को अपने छुपायें थे
दुख ना हो किसी बात से हमारी
 बड़ी मुश्किल से मौन रहना सीख पायें थे|सविता मिश्रा






### रिश्ता ###

१...आगोश
=========
मुस्कराहट भी अब दूर हो रही
जैसे चेहरे से हमारे
उदासियां खड़ीं बाहें फैलाये हमें अपने आगोश में लेने के लिए ..सविता


२...प्यार के दो बोल
=================

प्यार के दो बोल बोलता था कोई जेहन में शहद सा घोलता था कोई
ना जानें क्यों अब क्या हुआ ना वह बोलता ना हम ही बोलतें ...सविता मिश्रा

३..रिश्तों के रंग
=============

रिश्तों से करते रहे बहुत ही जंग
आज हमारे दिल हो गये जरा तंग|
रिश्तों के रंग आज बदरंग हो गये
चलता नहीं कोई दो कदम भी संग| सविता

## कुशन ##

 कुशन है तकिये की छोटी बहन
पर उपयोगिता तनिक भी नहीं है कम
सोफे पर सजी बहुत ही सुन्दर लगती
सुन्दर से सुन्दर लिहाफ से ढकी रहती
मेहमान आये तो ले गोद में बैठ जाये
या फिर पीठ को टिका तनिक आराम पायें

बच्चे आपस में जब लड़ने लग जाये
फेंक
एक दूजे पर कुश्ती में जुट जायें
बेचारी चुपचाप सारे जुल्मों को सह जायें

भाई तो गम के आंसू छुपायें और बहन
लड़ाई लड़ने और मारने के काम आयें

बच्चे जब एक दूजे पर फेंक थक जायें
फेंक कुशन को इधर-उधर ही चल जायें
बेचारी अपनी बेबसी पर आंसू बहायें
भाई तकिये से मिल अपना दुःख बता दुखी हो जायें ...
सविता मिश्रा

Monday, 5 November 2012

# क्या अपने ऐसे होते है #

सारी शाम हम यूँ ही बस
दुखी हो रुदन ही करते रहे|

अपनों से लगे अपने घाव को
अपने ही आंसुओ से धोते रहे|

पर घाव थे कहा बाहरी हुए
वह तो दिल पर थे किये हुए|

आंसुओ ने धोया तो नहीं
और भी गहरा कर दिया|

गुस्सा भी था मन में बहुत
क्यों कर दिल से लगा लिया|

क्यों कुछ अधिक हमने
उनसे अपनापन जताया|

क्या अपने ऐसे होते है
बात बे बात दिल पर घाव देते है| .....
सविता मिश्र

Sunday, 4 November 2012

## तकिया ##


तकिया भी बड़ी कमाल की चीज है
ना जाने कितने राज छुपा जाती है
होती तो सर के नीचे लगाने को पर
ना जाने कितने दर्द को भी समेटे रहती है
ना जाने कितने आंसुओ को शोख लेती है
दुखी दिल को छुपाने की ओट होती है
दर्द की भी गवाह होती है यह तकिया
खुशियों की भी गवाह होती है यह तकिया
तकिया की भी अपनी एक अलग कहानी है
कोई छेड़े नहीं नहीं तो राज खोल ही देगी
राज़दार है कितनी ही ग़मगीन रातों की
जो किसी की याद में रो रो कर बीते है |
  
 सविता मिश्रा

#### सत्य कब मीठा लगा ####


लिखो सत्य ही लिखो
भले ही वह थोड़ा कड़वा हो
सत्य कब किसे मीठा लगा
सुनने में बड़ा ही अटपटा भले लगे
पर सत्य पर असत्य ही भारी पड़ा है आज
असत्य को महत्व दे रहे है जो
सत्य को कैसे बर्दाश्त कर पायेगें
फिर भी बेधडक हो बिंदास लिखो आज
सहज हो सत्य का ही उजास लिखो
यकीन है हमें असत्य पर सत्य
विजयी ही होगा भले थोड़ी देर से सही .....| सविता

बस यूँ ही ....सविता

++मैं तेरे स्वागत में क्या गाऊ++



मैं तेरे स्वागत में क्या गाऊं रे ,

तुझ पर तो जाये कोयल भी वार ,
करूँ कौन से शब्द इस्तेमाल रे ,
तु तो है शब्दों का भण्डार |
मैं तेरे स्वागत में करूँ  क्या आज ,

तु तो है सभी का सरताज ,
तेरे लिए फिखा पड़ता है ,
मेरा यह स्वर्ण तख्तों ताज |
मैं तेरे स्वागत में कैसा दीप जलाऊ रे ,

तु तो स्वयं ही है प्रकाश ,

सूर्य कों दीपक दिखाऊ रे ,
मैं तो मन का दीप जलाऊ रे|
मैं तेरे स्वागत में फूल बिछाऊ रे ,
तु तो है फूलों से भी कोमल ,
फूल भी चुभ ना जाये कही ,
मैं अपना आँचल बिछाऊ रे |
||सविता मिश्रा ||

२८ /११/१९८९

~~क्या मैं तेरी कोख की जनी नहीं हूँ मैया~~

++क्या मैं तेरी कोख की जनी नहीं हूँ मैया++

मैया मेरे जन्म पर तू क्यों ,

इतना आँसू बहाती हो !
भैया के जन्म पर तो ,
खूब बन्दूक-पटाखे चलवाती हो !

मेरी कुछ भी गलती होने पर मैया ,
क्यों तू चुड़ैल कह बुलाती हो !
भैया की बड़ी से बड़ी गलती पर भी ,
तू क्यों उन्हें खूब प्यार जताती हो !

भैया को घी- चुपड़ी रोटी ,
मुझे सुखी ही पकड़ा देती हो !
भैया को दूध-बादाम बड़े प्यार से पिलाती हो ,
दूध में पानी मिला दे तू मुझे बहला देती हो !

भैया को खरोच लगे तो तू घर बाहर एक कर देती हो ,
खून मेरा बहने पर भी तू तवज्जों उसे नहीं देती हो !
थोड़ा सा दर्द हो रहा, भैया के कहते ही तू तो
डाक्टरों के चक्कर पे चक्कर लगाती हो
मेरी परवाह कहाँ मैया तुझे, मैं कितना दर्द से तड़पती हूँ
मुझे तो तू एस्प्रिन खा ले, कह डांट भगा देती हो |

मैं सानिध्य चाहू पल भर का तेरा, तू कहाँ मुझे देती हो
भैया को कंधे पर बिठा दिन-दिनभर रहती हो
लाडला बेटा मेरा राज करेगा, कह थपकी दे सुलाती हो
मेरे थके हारे शरीर पर तो तू, हाथ भी जरा सा नहीं फेरती हो |

नये-नये कपड़े, खिलौने भैया को दिलवाती रहती हो
मेले में हर घुमाने भी सिर्फ भैया को ही ले जाती हो
मेरे अरमानों का थोड़ा भी ख्याल न रखती हो
मैया बता तू मुझे , मुझसे दुर्भाव इतना क्यों रखती हो|

मैया मैं तो तेरा ही अंश हूँ ,
तेरा ही रूप हूँ ,
तेरा ही अस्तित्व हूँ !
मैया !
फिर क्यों करती हो
अनादर मेरा !
क्यों मुझसे करती सौतेला व्यवहार मैया
क्या मैं तेरी कोख की जनी नहीं हूँ मैया ?
++ सविता मिश्रा ++

+++औरत की कीमत+++


===================
आदमियत क्यों हर बार
भारी पड़ जाती है
औरत क्यों हर बार
दबी-कुचली बनी रह जाती है|
औरत क्यों ताकतवर होते हुए भी
कमजोर सी हो जाती है
औरत क्यों हर हाल में
हारी-हारी सी स्वंय को पाती है|

कितनी भी ऊँचाईयाँ छू ले
पर मर्दों की नजरों में
क्यों नहीं ऊँचाईयाँ पाती है
औरत क्यों स्वयं को ठगा सा पाती है
जिस दुनिया को बनाया उसी में खो जाती है
खुद को खोकर भी खाली हाथ रह जाती है
औरत क्यों ठगी-ठगी सी रह जाती है|

हर हाल, हर परिस्थिति में
अपने को ढाल लेती है
मर्दों पर भी राज कर लेती है
फिर भी क्यों नजरों में ओ़छी होती है
इन मर्दों की जननी औरत
मर्दों में ही सम्मान नहीं पाती है
मर्दों की हाथ का क्यों
खिलौना बन रह जाती है
कुछ भी कितना भी कर ले
अंततः मर्दों की ही बात रह जाती है|

औरत की कीमत क्यों
मर्दों के आगे कम हो जाती है
औरत दुर्गा,सरस्वती ,काली है
पर मर्दों की दुनिया में क्यों खाली-खाली है|
+++ सविता मिश्रा +++

===मजबूर ना थे===




हम तो हम थेपर अब जो तुम होवह पहले तुम ना थेकैसे समझाएहम खुद कोपहले कभी इतनेमजबूर न थे|
सविता मिश्रा

++क्यों तुम बिना मिले ही चले गये++



क्यों तुम?
बिना मिले ही चले गये
तुम्हारी !
वही चिरपरिचित आवाज
वही भीनी भीनी सी खुशबु
तुम आये...
और बिना मिले चले गये
मेज पर बिखरा था जो सामान
सलीके से सजा मिला
चादर तकिया ..
सब यथा स्थान मिला
तुम आये !
और बिना बोले चले गये
मैं सोती रह गयी!
उठाया भी नही
मुझसे तुमने !
चाय भी नहीं बनवाई
उठी जब!
घर के हर कोने में तुमको ढूढा
पर तुम हमको मिले नहीं कही
क्या था इतना जरुरी काम
कर ना सके!
मेरे जगने का भी इंतजार
तुम आये और ...
बिना बोले चले गये
अब मैं फिर करती रहूँ....
तुम्हारा इन्तजार

कब आओगे !
बता देना हमको इस बार
जागती रहूंगी!
सारी रात नहीं सोउगी
आना अब की बार....
बैठ खूब बतियाऊगी

इस बार की गलती...
फिर ना दोहराउगी......सविता मिश्रा

~~तू पास होते हुए भी~~

तू पास होते हुए भी मुझसे दूर रहा
बहुत मुश्किल से हमने उस दूरी को भी सहा ,
मिनट भी घंटो, घंटे दिन से लगे
सरक-सरक जैसे घड़ी की सुई चले ,

दूर था तो प्यार भरी घंटो बात तो हुई
पास रहते भी ना सही से मुलाकात हुई ,
बहुत कष्टमय है वह समय समझोंगे नहीं
       जब कोई पास रह के भी दूरी बना के चले | 
....सविता मिश्रा

Saturday, 3 November 2012


जिंदगी
++++++++++

दिल जब कभी बहुत
उदास हो जाता है तो
यूँ ही कुछ भी उटपटांग ही

दिल कह जाता है
पर बर्खास्त न कर पाओगें
जिंदगी को कभी भी
जब कभी करने पर आओगें
मोह माया में फंस ही जाओगें |

     सविता मिश्रा   

              आखिरी ख्वाइश

           +++++++++++++

                  

आ जाओ ओ मेरे मनमोहन कृष्णा तू ,

आँख बिछायें राहों पर इन्तजार तेरा करती हूँ |

दुःख हर लो तुम हमारे सभी ,

तुझसे यही प्रार्थना मैं करती हूँ |

ओ मेरे गिरधर तू मन में बसा है मेरे ,

यह जानते हुए भी मैं तेरे ही दरश को तरसती हूँ |

मन में बसी है मूरत तेरी ,

आँखों में बसी है सूरत तेरी ,

फिर भी प्रभु देखो ना मूर्खता मेरी ,

बाहर भटक-भटक खोजू मूरत तेरी |

ओ मेरे गिरधर मैं तेरे ही यादों में ,

हर वक्त खोयी -खोयी सी रहती हूँ |

तू अपना दरश करा दे मन की आँखों से ही सही ,

तन-मन की आखिरी ख्वाइस दबी है दिल के कोने में कहीं

|| सविता मिश्रा |

~ जिन्दगी ~

         जिन्दगी
++++++++++++
ओ जिन्दगी तेरे नखरे
सहते-सहते जब थक जायेगें
यूँ कुछ कर गुजर जायेगें
कि तुम अवाक स्तब्ध रह जाएगी
फिर भूले से भी हमें ना रुलायेगी ...सविता मिश्रा




जिंदगी
++++++++++

दिल जब कभी बहुत
उदास हो जाता है तो
यूँ ही कुछ भी
उटपटांग ही
कह जाता है
पर बर्खास्त जिंदगी को
कर न पाओगें
 कभी भी
जब कभी
करने पर आओगें
मोह माया में
फंस ही जाओगें |सविता मिश्रासविता मिश्रा


मेरे कृष्ण कन्हिया
+++++++++++++

ना कोख में पाला ना ही जन्म दिया ,
फिर भी कृष्णा तुने यशोदा को माँ का मान दिया |
हर नटखट शरारत को कर ,
माँ यशोदा को तुने निढाल किया |
चाँद खिलौना माँगा ,माखन नहीं खाया जताया ,

मिट्टी खा माँ को मुख मुख में ही सारा ब्रह्माण्ड दिखाया |
गोपियों की मटकी फोड़ीं ,माखन की चोरी किया ,
फिर भी भोला बन माँ की ओखली में भी बंध गया |
वात्सल्यमयी माँ बना यशोदा को तुने तृप्त किया ,
देवकी को ना जाने किस जन्म के पाप का फल दिया |

कोख में पाला जन्म तुझको उसने दिया ,
फिर भी अपनी अठखेलियों से मरहूम किया |
सारा-का-सारा प्यार तुने यशोदा को ही दिया ,
देवकी तो बस तरसती रही कुढ़ती ही रही कन्हैया |
कोख में पाला जन्म दिया जिसने तुझको कृष्णा ,
वही तेरी बाल रूप के दरश को सदैव तरसती रही कन्हैया |
||सविता मिश्रा ||