Tuesday, 24 December 2013

++देखो न++

आसमान में उड़ते रहते हो
जरा जमीं में उतर के देखो न
चश्मा पहन कर देखते हो दुनिया
जरा चश्मा उतार कर देखो न
स्वार्थ के लिए करते हो सब कुछ
जरा निःस्वार्थ बनकर देखो न
घर को अपने सजाते-संवारते हो
अपने देश को जरा संवार कर देखो न
जग में प्यारी-न्यारी हैं अपनी संस्कृति
जरा उसे अपना के देखो न
विरला ही होगा तुम-सा दुनिया में
खुद की नजरों में खुद को ही उठा के देखो न||
सविता मिश्रा

Thursday, 12 December 2013

हायकु

झांकते नहीं
गिरेबान अपना
दोषी दूसरा |...सविता मिश्रा

वक्तव्य देते
तन वसन पूरा
क्या बच जाती |..सविता मिश्रा

चिल्लाते रहे
ठेकेदार समाज
कपड़े कम |सविता मिश्रा

हुआ हादसा
अर्धनग्न थी वह
ठहाके लगे |सविता मिश्रा

गिरा आचार
क्या नहीं हो रहा
मासूम साथ |..सविता मिश्रा

दोषी औरत
ठहराते आदमी
कमी छुपाते |..सविता मिश्रा

माक़ूल नहीं
दोज़खी हर कही

संभल नारी |सविता मिश्रा

विक्षिप्त हुआ
मानुषिक विचार
आरज लुप्त |सविता मिश्रा

दोषारोपण
दूजे के मथ्थे मढ़
महामति थे |सविता मिश्रा

दोष खुद का
छिद्रान्वेषी मानव
भीड़ ऐसे की |सविता मिश्रा

Friday, 6 December 2013

~फेसबुकिया मम्मी~


फेसबुक अकाउंट बना पकड़ा दिया हमको
मम्मी देखो ऐसे-ऐसे होता है समझा दिया हमको
पर हम ठहरे मूरख एक बात भी ना समझे थे
क्या करें कैसे करें कुछ भी ना सीखे थे
आर्कुट ही लगता अपने को चंगा
फेसबुक खोल कौन लेता पंगा
आर्कुट पर ही १५- २० मिनट बिताते
सब की फोटो देख खुश हम हो जाते
कौन अपने पर दे रहा कम्मेंट
कुछ ना अता-पता चलता था
फिर भी थोड़ा बहुत वही पर
अपना खाली वक्त बीतता था |

पर उसके बार-बार समझाने पर
धीरे-धीरे कुछ-कुछ समझने लगे थे
एकाक गाने की लाइन पोस्ट कर
फेशबुक की राह पर चलने लग पड़े थे
एक-दो लोग अच्छा कह कर जाते
हम भी धन्यवाद कह खाना पूर्ति कर आते
पर जब सब धीरे-धीरे समझ आने लगा
मंचो से जुड़ने पर अपना मुहं भी खुलने लगा
कोई कुछ भी कहता जबाब झट दे देते
दुआ सलाम होता भाइयों से बैठ बतिया लेते|

शैने-शैने फ्रेंड लिस्ट की संख्या लगी बढ़ने
सब मंच से निकल अपने लिस्ट में लगे थे जुड़ने
फिर क्या था जो दस मिनट में था दम घुटता
ना जाने कब समय बीतने लगा घंटा दो घंटा
अब बिटिया कहती सिखाकर गलती कर दी
मम्मी तो हमारी फेसबुकिया मम्मी हो ली
दाना-पानी देना सब भूल जातीं इस चक्कर में
हमसे ज्यादा खुद ही अब समय बिताती हैं इसमें|
पतिदेव भी कभी-कभी खीझ ही जाते
जब फेशबुक का चक्कर लगाते हमें पाते
तुम तो इस चक्कर में घर को ही भूल जाती हो
हमको भी थोड़ा भी समय नहीं दे पाती हो
तुम ऐसा करो क्यों नहीं इसको ही छोड़ देती हो?

क्या करें हम तुम्हीं बतलाओ
मेरे अस्तित्व को ऐसे तो न झुठलाओ
छूटी थी जो लेखनी इसी से फिर हम पकड़ पाये
रोज कुछ ना कुछ अब तो लिख ही यहाँ जाये
फिर बताओ कैसे हम इसको छोड़ पाये
फालतू का समय ही तो हम यहाँ बिताये
मन के भाव जो दब गए थे कहीं एक कोने
वह फिर से कागज को स्याह करके
अभिव्यक्ति किसी ना किसी रूप में होले |...सविता मिश्रा

Wednesday, 4 December 2013

+मध्यम आंच में खीर खूब मीठी बनती है+

हमारे लिए शादी और गौने के
बीच की दीवार भी ना थी
दोनों एक ही साथ
निपटा दिए गये थे
घुघट में उनके दरवाजे
पर दस्तक दे चुके थे
जिन्हें कभी देखे ही न थे
दिल के दरवाजे नहीं खोले थे
शादी के महीनों बाद तक
मस्तमौला थे
नहीं संजोये थे
सपने किसी के लिए
अब जागती आँखों से
सपना सा देख रहे थे
अपने ही सामने पर
नहीं देखा था
खुली आँखों से
महीनों तक
सपनों के राजकुमार को
शर्म से नजरे
झुकी होती थी
आवाज को
बखूबी पहचान लेते थे
निगाहों से निगाहें
मिली ना थी
तो आँखों ही आँखों में इशारा हो गया
गाना भी नहीं गुनगुना सकते थे
क्योकि मोहब्बत
किस चिड़िया का नाम हैं
नहीं समझते थे तब तक
प्यार परवान भी ना चढ़ा था
समय के साथ
परवान चढ़ता गया
अब इतना परिपक्व हो गया
कि किसी की भी लगायी आग का
असर नहीं होता हैं
अपने प्यार को देख
लगता है कि
सही कह गये कुछ सयाने
मध्यम आंच में खीर
खूब मीठी बनती है| सविता