Wednesday, 31 December 2014

विदा २०१४

दिन +हफ्ते +महीने कर कर के २०१४ का कलेंडर  बदल गया ....यदि कुछ नहीं बदला तो वह है इंसान का दिलोदिमाक ...नए से कोई ख़ास उम्मीद नहीं पर हा जैसे पिछले चार-पांच साल बिते  वैसे ना बीते तो अच्छा ....आगे हरी इच्छा
जीवन को उधेड़ बुन कर अच्छे -बुरे समय को समझना बड़ा मुश्किल हैं, हो सकता है बहुत से पल वो भी आये हो जो अमृत पान कराएं हो, पर वह पल किसे याद रहते है -हा गम के चाबुक कभी नहीं भूलते .....इन्ही चाबुको के बीच अपने और गैर का हम चुनाव कर लेते है...|

कोई गैर अपना बन दिलोदिमाग में घर कर जाये अच्छा लगता है| कोई बनना चाहे अपना तो भी अच्छा लगता है, पर अपना गैरों सा बर्ताव करें बहुत बुरा लगता है ...फिर भी समय के साथ हर रिश्तें पर धूल ज़मने देते है कभी रिश्तों पड़ी धूल साफ़ करने की भरपूर कोशिश करते है ......कुछ रिश्ते पर कोशिशें कामयाब होती है, कुछ पर नहीं ....समय फिर भी नहीं रुकता ...महीने साल बीतते जाते है समयानुसार ....कभी-कभी अथक परिश्रम कर हम खुद को ठगा सा पाते है ..कभी हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा समय के साथ हो लेते है .....चलिए समय के साथ, सब कुछ समय पर छोड़  ...उप्पर वाले ने कोई तो समय मेरे लिय या आपके लिय भी बनाया ही होगा ..मूक बन उस समय का इन्तजार करिए ....बस निस्वार्थ कर्म करते हुए .....
वैसे तो निस्वार्थ कर्म करने को कहना बेमानी सा ही है क्योकि इस आज की दुनिया में कोई निस्वार्थ कहाँ हैं भला|

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया///हर व्यक्ति यदि ऐसी सोच रक्खे ऐसी प्रतिज्ञा कर ले तो, न गये समय के दुःख दर्द याद आये, न नये समय से आशंकित हो ...दुःख हो सुख हो अपनों के कंधे का सहारा मिलें तो भवसागर भला कौन नहीं पार कर लेंगा ...पर हम इसी उधेड़ बुन में रहते है कि किसने, कब,कैसा मेरे साथ किया उसे कब, कैसे गच्चा देना है ...बस समय अपनी राह हो लेता है और हम कष्ट में डूबते ही अपनों का साथ न पा तमतमा जाते है क्योकि अपने जो होते है वह कष्ट में कन्धा देने के बजाय अपनी ही उधेड़बुन में लगे होते है कि कब पैरो के नीचे से चादर खींची जाये |  ख़ुशी की सीढी कोई नहीं बनना चाहता है, सब गम की लिफ्ट बन जल्दी से जल्दी उप्पर पहुँचाना चाहते है| अपनों का साथ सभी को चाहिए होता है, पर कोई अपना साथ देने को तैयार नहीं होता|
वक्त  के साथ चलिए ,वक्त -वक्त पर मिलते रहिये, वर्ना वक्त यदि बित गया किसी तरह तो वह व्यक्ति खुद ही नहीं याद रखेगा कि आप किस खेत की मूली थे | क्योंकि वक्त एक न एक दिन घूमफिर कर सभी का आता ही हैं| :) सविता मिश्रा
बोलिए गणेश भगवान् की जय :) :D

Wednesday, 3 December 2014

~इतना सारी समस्याएं लड़ें तो लड़ें कैसे ~

अदना सा आदमी कितनों से लड़ता फिरे | अपने विचारों से, परम्पराओं से, नियमों से, कानून से, विसंगतियों से, संगतियो से भी, अव्योस्थाओं से, झूठे आरोपों से, तकियानुसी विचार धाराओं से, एक अजीब ही ढर्रे पर चलती नियमों से, जो बदलना ही नहीं चाहती,सरकार से, भ्रष्टाचार से, महंगाई से, जिन्दगी से, मौत से भी, और तो और इन आकाश में घूमते पर अपने ही आसपास चालों की बिसात बिछातें इन ग्रह नक्षत्रों से ....|एक मामूली सा कमजोर आदमी और इतना सारी समस्याएं लड़ें तो लड़ें कैसे .....?

सब से यदि लड़ भी ले तो आखिर प्रारब्ध और उस अदृश्य शक्ति से कैसे लड़ें ...?
कभी कभी लगता हैं हार कर बैठ जाएँ एक कोने में, और सब कुछ उसके मर्जी पर छोड़ दिया जाएँ| सविता .............

Tuesday, 2 December 2014

~हाइबन~

पहली हमारी कोशिश हाइबन लिखने की इधर आइये तो पढ़ अवश्य बताइए कैसी है यह अदना कोशिश ....आप सभी के इंतजार में मेरी यह रचना ...:)

ओह कितनी खुबसुरत तस्वीरें है| काश मैं भी घूम पाती ! इस नाव में, पतवार मैं चलाती और तुम बैठते| जिन्दगी की नाव तो तुम्ही खे रहे हो न | पहाडियों पर चढ़ के तुम्हारा नाम पुकारती| सुनती हूँ, एक बार नाम बोलो तो कई बार गूंजता है| मैं पूरे फिज़ा में तेरे नाम की ही गूंज बसा देती|
समुद्र की शांत पड़े पानी में डूबते सूरज की अरुणाई को निहारती रहती| स्वर्णिम आभा को अपने हृदय में बसा लेती हमेशा-हमेशा के लिय| सब कहते है कि स्त्रियों को स्वर्ण बहुत पसंद है पर तुम तो जानते हो न मुझे बिल्कुल भी नहीं पसंद| पर यह स्वर्ण आभा मैं अपने अंदर बसा सबको अलानिया बताती कि देखो, मुझे भी स्वर्ण पसंद है| सच्चा स्वर्ण बिल्कुल ख़ालिस, कोई मिलावट नहीं |
और तो और एक टका भी न लगेगा इस स्वर्ण को अपने शरीर पर धारण करने पर |
ये सुन रहे हैं न या फिर मैं बके जा रही हूँ| हू हा सुन रहा हूँ!उहू तुम भी न कभी तो मेरी बातें भी सुन लिया करो, घूमा नहीं सकते तो ना सही|
अच्छा दीदी आप बताये आप तो घूम के आई है ???
क्या बताऊ सवित ! जितना तुम तस्वीर देख बयान कर दी, उतना तो हम वहां देखकर भी महसूस नहीकर पायें| हा थक जरुर गये घूमते घूमते| देखो पैरो में सूजन अब भी हैं|
अरे दी आप भी ध्यान से देखिये इन तस्वीरों को सारी थकान दूर हो जायेगी| कितनी खुबसुरत शानदार तस्वीरें आप और जेठजी ने खिंचवाई हैं| देखिये जरा गौर से .......

मन लुभाती
हरियाली बिखरी
कृति निखरी|


पक्षी बन मैं
प्रकृति छटा देखूं
मनु से दूर| ..............सविता मिश्रा

Sunday, 23 November 2014

~ बदलाव ~

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ढ़ाबे पर काम करते करते आज पांच साल हो गये थे| बंटी का व्योहार अब बदलने लगा था| मालिक डांट देता  जब तब पर, "क्या लडकियों की तरह शर्माता है| जल्दी जल्दी काम निपटा|"
 बंटी था कि अब आर्डर लेने से बचने लगा था| जब भी किसी नशेबाज को देखता उनकी आवाज सुनी ही नहीं ऐसा अहसास कराता|
मालिक को अब शक होने लगा कि कही यह भाग ना जाये, तो नज़र रखने लगा| एक दिन अचानक उसकी नजर नहाते हुए बंटी पर पड़ गयी वह दंग रह गया|
पास बुला उसकी पगार दें उसे वहां से घर जाने को कहने लगा, क्योकि वह कोई पुलिस का पंगा नहीं चाहता था| अच्छा- खासा उसका ढ़ाबा चल रहा था|
पर बंटी रोने लगा बोला ! "साब मुझे मत निकालो, बाबा दीदी की तरह मुझे भी बेच देंगे| मुझे यहाँ से अपने घर में नौकरी पर रख लो...., बचपन से आपके यहाँ काम किया है आप जानते हो मैं कामचोर नहीं हूँ|"
"अच्छा ठीक" कहते ही बंटी अब खिलखिला पड़ा|
मालिक घर पर फोन लगा अपनी जोरू से बोला -"बिन्नी को भेज रहा हूँ, 'मेहनती' है तेरा हर काम में हाथ बटायेगी, अब खुश न ...कहती है मैं तेरा ध्यान नहीं रखता|"  सविता मिश्रा

Monday, 3 November 2014

*इच्छा-शक्ति*

आंसू चीख-चीख कह रहे थे कि जो हुआ उसके साथ वह बहुत गलत हुआ| पर जुबान थी कि ताला जड़ चुका था|
दीपावली के विहान खुशियों का लेखा-जोखा करते, पर अब गम की नदी में गोते लगा रहे थे| हंसता-खेलता परिवार आज गमजदा हो गया था| रह-रह हर बात को लघुकथा में ढ़ालने वाला शख्स आज आँखे मूदें पड़ा था|

ना जाने कितनी लघुकथायें उसके अवचेतन मन में दफ़न हो रही थी| वह बोलना चाहता था कि मैं लिखूंगा जब उठाऊंगा कलम, खूब ढेर सारी घटनाओं पर लिखूंगा| मैं जो यह यमराज से लड़ रहा हूँ ना, वह भी लिखूंगा देखना तुम| पर पत्नी थी कि दुःख के सागर में डूबी, उसके दिलोदिमाग को नहीं पढ़ पा रही थी|
बस कलम उठने ही वाली हैं, आखिर हजारों दुआओं में अमृत-सा असर जो हैं| सविता मिश्रा Savita Mishra

Friday, 31 October 2014

सच्चा--दीपोत्सव

घर-घर दीप जल रहें थे|बगल ही झुग्गी झोपड़ी में भी दीप जलाने की ललक थी| दीपक-बाती खरीद भी लेते किसी तरह, पर तेल कैसे खरीद पातें| कहाँ था उनके पास इतना पैसा|
बच्चे थे कि जिद किये थे| नहीं मैं तो दीपक जलाऊंगा,और साहब के बेटे की तरह पटाखे भी, शेखर तो यह कह अड़ा था अपनी जिद पर|त्यौहार पर बेबस माँ बस आंसू ही बहाये जा रही थी| और समझाने में लगी थी कि -- "बेटा पढ़-लिख लेगा, बड़ा अफसर बन जायेगा तो हम भी दीपक जलायेंगे और खूब पटाखे भी|"

अब तो जैसे शेखर को जूनून सवार हो गया| किताब पकड़ ऐसे बैठा कि आई-ए-एस टॉप करके ही छोड़ा|
आज फिर दीपावली का दिन हैं| और झुग्गी से वह बड़े से सरकारी घर में आ गया है| पुरे घर-बाहर नौकर-चाकर दीपक जलाने में लगे हैं| पर शेखर के मन का अँधेरा नहीं दूर हो रहा|
एक दीपक जला माँ के तस्वीर के आगे रख रो पड़ा| फिर कार उठाई और ढेर सारे दीपक-बाती, मिठाई,पटाखे लेकर नौकर के साथ चल पड़ा झुग्गीवासियों के बीच| सभी झुग्गी जगमगा रही थी, बच्चे खुश हो पटाखे चलाने में मशगुल हो गये| सच्चा दीपोत्सव तो उसका अब जाके हुआ था| Savita Mishra

Saturday, 25 October 2014

~ सुखद क्षण ~

सुखद क्षण
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बच्चे को सड़क पर लोटते देख शीला ठहर गई | बगल ही खड़ी माँ से पूछने पर पता चला बच्चा दीपावली पर पटाखे लेने को मचल रहा था| औरत के पास इतने पैसे ना थे कि वह पूजा के लिय लक्ष्मी-गणेश, बताशे लेने के बाद उसे पटाखे भी दिला
सकें | जिद्द में आ बच्चा वही पानी में लोट गया| शीला ने अपने बेटे के लिए खरीदें पटाखे में से कुछ उसे दें दिए| वह खुश हो गया, पर शीला का बेटा रोने लगा|
उसे चुप करातें हुए ठण्ड से कांपता बच्चा बोला- "तू भी लोट जा यहाँ, फिर तेरी मम्मी तुझे और ज्यादा पटाखे दिलाएगी |"

Saturday, 18 October 2014

जोड़ -घटाना

मम्मी! "ऑन लाइन आर्डर कर दूँगा, या चलिए माल से दिला दूँगा, वह भी बहुत खूबसुरत-खूबसुरत दीए, चलिए यहाँ से | इन गवांरो की भाषा समझ नहीं आती, उप्पर से रिरियाते हुए पीछे ही पड़ जाते है | बात करने की तमीज भी नहीं हैं इन लोगों में |"
मम्मी उस दुकान से आगे बढ़ बुढ़िया के पास से खरीदने को जमीन में बैठ दिए चुननें लगी | क्या मम्मी -"आप ने तो मेरी बेइज्जती करा दी, मैं 'हाईकोर्ट का जज' और मेरी माँ जमींन पर बैठी दीए खरीद रही | जानती हो कैसे-कैसे बोल बोलेंगे लोग | जज साहब ...."
बीच में ही माँ आहत हो बोली ..."इसी जमीन में बैठ ही दस साल तक सब्जी बेची है, और कई तेरी जैसो की मम्मियों ने ही ख़रीदा हैं मुझसे सब्जी, तब जाके आज तू बोल रहा है, वह दिन तू भले भूल गया बेटा, पर मैं कैसे भुलू भला| तेरे मॉल से या ऑनलाइन दीए तो मिल जायेंगे बेटा, पर दिल कैसे मिलेंगे भला |" सविता मिश्रा

Saturday, 4 October 2014

~ दोगलापन ~(लघु कथा )

"कुछ पुन्य कर्म भी कर लिया करो भाग्यवान, सोसायटी की सारी औरतें कन्या जिमाती है, और तू है कि कोई धर्म कर्म है ही नहीं|"
"देखिये जी लोग क्या कहते है, करते है इससे हमसे कोई मतलब ......"
बात को बीच में काटते हुए रमेश बोले- "हाँ हाँ मालुम है तू तो दूसरे ही लोक से आई है, पर मेरे कहने पर ही सही कर लिया कर|"
नवमी पर दरवाजे की घंटी बजी- -सामने छोटे बच्चों की भीड़ देख सोचा रख ही लूँ पतिदेव का मन | जैसे ही बिठा प्यार से भोजन परोसने लगी तो चेहरे और शरीर पर नजर गयी किसी की नाक बह रही थी, तो किसी के कपड़ो से गन्दी सी बदबू आ रही थी, मन खट्टा सा हो गया | किसी तरह शिखा ने दक्षिणा दे पा विदा कर अपने हाथ पैर धुले|
"देखो जी कहें देती हूँ इस बार तो आपका मन रख लिया, पर अगली बार भूले से मत कहना........| इतने गंदे बच्चे जानते हो एक तो नाक में ऊँगली डालने के बाद खाना खायी| मुझसे ना होगा यह....ऐसा लग रहा था कन्या नहीं खिला रही बल्कि.....भाव कुछ और हो जाये तो क्या फायदा ऐसी कन्या भोज का | अतः मुझसे उम्मीद मत ही रखना |"
"अच्छा बाबा जो मर्जी आये करो, बस सोचा नास्तिक से तुझे थोड़ा आस्तिक बना दूँ|"
"मैं नास्तिक नहीं हूँ जी. बस यह ढोंग मुझसे नहीं होता समझे आप |"
"अच्छा-अच्छा दूरग्रही प्राणी |"...पूरे घर में खिलखिलाहट गूंज पड़ी
पड़ोसियों ने कहा -यार तेरी मुराद पूरी हो गयी क्या ? बड़ी हंसी सुनाई दे रही थी बाहर तक| हम इन नीची बस्ती के गंदे बच्चो को कितने सालो से झेल रहे है, पर नवरात्रे में ऐसे ठहाके नहीं गूंजे ..बता क्या बात हुई|"
शिखा मुस्करा पड़ी .....सविता

Friday, 3 October 2014

~जलती हुई मोमबत्ती~


शरीर जल(ख़त्म हो) रहा है,लेकिन आत्मा तो अमर है| मोमबत्ती की तरह मैं भले काल कवलित हो गया हूँ, पर इस लौ की भांति तुम सब की आत्माओं में बसा हूँ| जब हिंदी के प्राध्यापक महोदय ने भाषण की शुरुआत इन शब्दों से की तो रूचि भयभीत हो गयी|
दादी से आत्माओं की कहानी खूब सुन रखी थी | दादी ने कहा था अच्छी आत्मायें, बुरी आत्माओं को खूब सताती है| उसे लगा सत्य,अहिंसा के पुजारी बापू आज उसकी खूब खबर लेंगे| पूरी कक्षा क्या स्कूल की दादा जो थी वह| सुबह प्रार्थना से पहले ही उसने अपनी दोनों  सहपाठियों की पिटाई कर दी थी, छोटी-बड़ी मोमबत्ती को लेकर| बच्चों से मारपीट-गाली गलौज के बाद, शिक्षक से मार खाना तो रोज की आदत सी थी उसकी|

सहसा उसने  बापू के चित्र की ओर देखा - बापू के चित्र पर लौ चमक रही थी, बापू की आँखे भी बंद थी| उसे लगा बापू बच्चों में बसी अच्छी आत्माओं से सम्पर्क कर, उन सब को अपनी तरह बनने की सीख दे रहें हैं|
अगले ही पल वह अपने सहपाठियों से क्षमा मांग,उनके गले लग गयी| उसकी इस अप्रत्यासित हरकत से दो-तीन के आँखों में आंसू आ गये,और कुछ हतप्रभ से थे -कौवे को हंस रूप में देख|
प्राध्यापक महोदय भी ख़ुशी से बोले- "भले ही आज लोग सफाई  कर ख्याति अर्जित कर रहे है, पर असली सफाई तो तुमने की है| आज हमारे स्कूल द्वारा दिया जाने वाला 'गांधी सम्मान' मैं सर्वसम्मति से तुम्हें सौंपता हूँ|" सविता मिश्रा

Sunday, 28 September 2014

~मुश्किल है कामचोर बनना ~

वैसे तो कामचोर नहीं थे हम-- पर भाई लोग अक्सर कामचोर ही कहतें| सफाई, खजांची यानि जिम्मेदारी का काम बखूबी करते थे| पर हाँ रसोई के कम से जी अवश्य चुराते थे| भोजन जब भी बनाना पड़ता उल्टा-सीधा ही बनाते| कभी कुकर  में चावल के साथ पानी डालना भूल जाते तो कभी दाल में नमक, हल्दी| हाँ पत्रिका में पढ़ कुछ बनाना हो तो अवश्य मजा आता, बड़ी तन्मयता से बनाते|

पहले भट्ठी जला करती थी तो बहाना रहता  छोटे है अभी, जल जायेगें| फिर गैस आई, पर तब तक भाभी का आगमन हो चूका था, अतः उनकी जिम्मेदारी थी रसोई की|अतः ज्यादा जरूरत ना पड़ी| उनके मायके जाने पर ही ऐसे तैसे न जाने कैसे बना ही लेते दाल-चावल रो गाके| :(  पर रोटी फिर भी मम्मी सेंकती थी| स्कूल में भी होमसाइंस विषय था, अतः बनाना पड़ता, कम से कम इम्तहान के समय| पर वहां भी सहेलियों की मदद से बन जाता|
पर समय की ऐसी मार पड़ी की भोजन बनाना ही पड़ा| अरे बाबा हर लड़की को समय की ऐसी मार पड़ती ही हैं, इसमें आश्चर्यजनक जैसी कोई बात नहीं| हाँ पुरुषों को पड़े तो जरुर घोर आश्चर्य की बात है| :p  हाँ एक आश्चर्य की बात जरुर थी कि जो लड़की स्कूल इम्तहान में पम्पवाला स्टोव के बजाय हीटर ले जाती थी, यानि स्टोव जलाना नहीं आता था उस लड़की को, उसने चूल्हें तक में खाना पकाया|
धीरे-धीरे रसोई में घंटो छोड़िये, चार-चार, छह-छह घंटे बिताने पड़ते दिन भर में| समय हर कुछ बदलने की कूबत रखता है,और मेरा भी रसोई से भागने का स्वभाव समय ने बदल ही दिया| सविता मिश्रा

*एक बुराई .... जिस पर आपने जीत हासिल की हो *
एक प्रतियोगिताआयोजन में लिखा गया संस्मरण कह लीजिये :)

Thursday, 25 September 2014

~प्राणवान दुर्गा~

स्कूल के प्रांगण में ही कोलकत्ता से कलाकार आते थे माँ दुर्गा की मूर्ति बनाने| सब बच्चें चोरी-छिपे बड़े गौर से देखते माँ को बनते|
ऋचा को तो उसकी कक्षा के बच्चे खूब चिढ़ाते रहते|
 "देखो तिरेक्षे नयन बिल्कुल ऋचा की तरह है |" सुमी  बोली
"और क्रोध भी बिल्कुल  माँ के रूप की तरह इसमें भी झलक रहा है|" रूचि  बोली
"हा करती हूँ क्रोध और माँ दुर्गा की तरह ही दुष्टों का नाश कर दूंगी|" चिढ़ के ऋचा बोली
"अब तुम सब चुप रहती हो या जाके टीचर से शिकायत करूँ सब की|" तमतमाते हुय बोली ऋचा
"यार चुप हो जा, जानती है न यह टीचरों से भी कहा डरती हैं, जाके शिकायत कर देगी, फिर मार पड़ेगी हम सब को|"
"हाँ यार ये कलाकार तो बेजान माँ दुर्गा की मूर्ति गढ़ रहा है पर प्रभु ने तो चौदह साल पहले यह प्राणवान दुर्गा गढ़ भेज दी थी|" सुमी बोली
"वैसे भी यहाँ मूर्ति पास आना मना भी है, पता चलते ही घर पर शिकायत पहुँच जायेगी|" रूचि के कहते ही सब वहां से भाग ली|  सविता मिश्रा

Wednesday, 24 September 2014

~प्यास~(लघुकथा)

फुसफुसाने की आवाज सुन काजल जैसे ही पास पहुँची सुना कि -तुम आ गये न, मैं जानती थी तुम जरुर आओगें, सब झूठ बोलते थे, तुम नहीं आ सकते अब कभी|
"भाभी आप किससे बात कर रही हैं कोई नहीं हैं यहाँ"
"अरे देखो ये हैं ना खड़े, जाओ पानी ले आओ अपने भैया के लिय बहुत प्यासे है|"
डरी सी अम्मा-अम्मा करते ननद के जाते ही भाभी गर्व से मुस्करा दी| .........सविता मिश्रा

Sunday, 21 September 2014

~मिस फायर~

पति-पत्नी में छोटी सी बात पर, बहस इतनी बढ़ गयी कि बसंत ने अलमारी में रक्खी रिलाल्वर निकाल ली| अपनी कनपटी पर तान सुधा को धमकाने लगा| सुधा अनुनय-विनय करती रही पर शराब का नशा सर चढ़ कर बोल रहा था| वह भ्रम में था कि हमेशा की तरह रिवाल्बर चलेगी नहीं,  और विजयी मुस्कान उसके चेहरे पर दौड़ रही होगी| उसका अहम् जीत जायेगा| यही सोच उसने ट्रिगर दबा दिया, पर होनी को कुछ और ही मंजूर था| मिस फायर करने वाली रिवाल्बर आज....|
उसकी जान की दुश्मन रिवाल्बर की गोली इसी दिन की घात लगाये बैठी थी| आज वह सफल हो इठला रही थी पर घर में मातम पसर गया था|

++ सविता मिश्रा ++

Friday, 19 September 2014

नन्ही चिरैया

"भैया आंखे बंद कर हँसते हो तो कितने अच्छे लगते हो|" गद्गुदी करती हुई परी बोली
भाई खिलखिला पड़ा फिर जोर से| परी भी उन्मुक्त हंसी हंसती रही| दोनों हँसते-हँसते कहा से कहा आ गये थे|
"अरे पापा वह आंटी का घर तो पीछे रह गया|"
"उन्होंने दस बजे तक बुलाया था, आज कन्या खिलाएगी न" परी हँसते हुए बोली|
"अरे मेरी नन्ही चिरैया चिंता ना करो पहुंचा दूँगा, आज खाली हूँ अभी और घुमा दूँ तुम दोनों को|"
"हाँ पापा घुमा दो रिक्शे पर घूमें बहुत दिन हो गये|" बंटी बोला
"और हाँ वही अगल-बगल घरों में ही जाना और कही नहीं जाना मैं दो घंटे में आऊंगा लेने|"
"नहीं जाऊँगी पापा, खूब ढेर सा प्रसाद मम्मी के लिय भी ले लूँगी आंटी से, मम्मी बीमार है न खाना कहा खायी है|"
"

और पापा आपके लिय भी" चल चल भैया दोनों खिलखिलाते हुए चल पड़े उन घरों की ओर जहाँ कन्या जिमाई जा रही थी| सविता मिश्रा

Wednesday, 10 September 2014

पिछलग्गू(लघु कहानी)

पिछलग्गू
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सुरेश, किशोर के पीछे-पीछे लगा रहता था, वह कुछ भी बोलते, उनको दाद देता कि "वाह सर क्या बात कहीं आपने" वह उसके सीनियर जो थे| सभी आफिस वाले उसके इस हद से ज्यादा की चमचागिरी से परेशान थे| कानाफूंसी करते की काम धाम तो कुछ करता नहीं बस चमचागिरी में लगा रहता है| उसे देखते ही खिल्ली उड़ाते अरे देखो-देखो आ गया चिपकू| यह बात किशोर के कानो तक भी पहुंची| उन्हें कुछ सुझा-एक दिन एक साधारण सा कपड़ा पहने सर पर तौलिया लपेटे कुछ काम लेकर पहुँच गये! चपरासी देखते ही पहचान गया, पर किशोर ने इशारे से चुप रहने को कह दिया|
 सुरेश के पास पहुंचे तो कागज हाथ में आते ही सुरेश उन्हें पाठ पढ़ाने लगा "नहीं ऐसा नहीं ऐसा है, आप छोड़ जाइये मैं देख लूँगा!"उसके चेहरे की ओर भी ना देखा|
चपरासी ने कहा ..."सर वह सही तो बोल रहे थे, आपने उन्हें देखा भी नहीं और ना उनके कागज देखे, लौटा दिया |"
"अरे राम भरोसी यह "बाल" धूप में नहीं सफेद किये मैंने, बस कपड़े से समझ गया कैसा व्यक्ति है, दौड़ने दो कुछ दिन|" सुरेश बड़े तीसमारखा की तरह बोला|

तभी सूट-बूट में किशोर आ गया और उसी काम को करने को बोला जो वह साधारण सा कपड़ा वाला व्यक्ति दे गया था .. सुरेश ने झट से कागज निकाले और मुहं लटकाए केविन में जाते ही, "सौरी सर गलती हो गयी, आइन्दा से कभी ना होगी|" बाहर निकलते हुए चपरासी को मुस्कराता देख सुरेश उप्पर से नीचे तक जलभुन उठा| सविता मिश्रा १०/८

Sunday, 7 September 2014

कक्षोन्नति -

"सिर्फ अस्सी, अंग्रेजी मेsडियम में पढ़कर भी सीटू तेरे इतने कम नम्बर आये हैं अंग्रेजी में !"  माँ थोड़ी नाराज होते हुए बोली।
"मम्मी, आपकी अंग्रेजी तो कितनी कमजोर है ! इंग्लिश मीडियम होता है।" स्वीटी मम्मी को अंग्रेजी का एक शब्द अटकते हुए बोलती सुनी तो बोल पड़ी।
"बताइए न मम्मी,आप पढ़ने में कैसी बच्ची थीं? तेजतर्रार या कमजोर?" बगल बैठा सीटू जिद करके पूछने लगा।
"अच्छा सुन ! बताती हूँ ! बात उन दिनों की है जब मैं चौथी कक्षा में थी | अंग्रेजी विषय तो जैसे अपने छोटी सी बुद्धि में घुसता ही न था|"
"अच्छा, तभीss..!"
"अंग्रेजी की टीचर भी बड़ी खूसट किस्म की थी। मारना और चिल्लाना ही उनका ध्येय था| उनके क्लास में आते ही सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी अपनी|"
हां, हां, जोर से हँस पड़ा बेटा।
" हँस मत, जिस दिन रीडिंग का पीरियड होता था , उस दिन जान हलक में अटकी रहती थी | अपनी बारी ना आये, भगवान से प्रार्थना ही करती रहती थी। एक दिन रीडिंग करने खड़ी हुई तो नाम मात्र जो आता भी था, वह भी डर से बोल नहीं पा रही थी मैं |"
"यह था, मेरी माँ हिटलर की तो डर गया था!" स्वीटी बोली
"हुउss, तब दो बार तो कस के डांट पिलाई टीचर ने | डांट खाते ही दिमाग तो जैसे घास चरने चला गया| अब तो बोलती ही बंद | इतना अटकी ..इतना अटकी...कि क्या बताऊँ ..! बड़ी तन्मयता से किताब को घूर रही थी बस, खोपड़ी पर डंडा जब बरसा तब तन्मयता टूटी अपनी| उनका डर इतना था कि चीख हलकी सी ही निकली, पर आँखों से आंसू, झरने सा बहा था मेरे |"
वनिता ने जैसे ही बोलना बंद किया कि बच्चे हँस लिए, "मम्मी आप इतनी कमजोर थी पढ़ने में, और हमें कहती है नम्बर हम कम लाते हैं!"
"अच्छा मम्मी, क्लास में कौन सी पोजीशन आती थी आपकी ?"
"अरे बच्चों, यह मत ही पूछो! कोई औसत दर्जे का छात्र....
बात काटते हुए तभी बच्चों के पापा तपाक से बोले- " और तुम्हारी मम्मी तो कक्षा में उन्नति करती थी |"
"मतलब ?" सीटू बोला
"मतलब कक्षोन्नति आती थी तुम्हारी मम्मी! जिसका मतलब निकालती थी कि इन्होंने कक्षा में उन्नति की है| जबकि मतलब था ग्रेसमार्क्स पाकर किसी तरह पास हो गयीं हैं उस कक्षा में |"
उनकी बात सुनकर पूरे माहौल में ठहाका गूँज गया| वनिता भी सर झुका हँसते हुए बोली- "तब के जमाने में 33% ले आकर पास हो जाना भी बड़ी बात होती थी!"
"हाँ, किन्तु ..!
"कक्षोन्नति तो अंग्रेजी, हिन्दी के कारण आती थी मैं।" ..सविता मिश्रा 

Friday, 5 September 2014

ओहदा

इस चित्र पर नया लेखन ग्रुप में
"तू मुझसे चार साल छोटा था, कितनी बार तुझे डांटा-मारा मैंने | यहाँ तक की बोलना बंद कर देता था, जब तू कोई गलती करता था| फिर भी तू मुझसे हर पल चिपक माफ़ी मांगता रहता| आज मेरी एक छोटी सी बात का तू इतना बुरा मान गया कि परिवार सहित चल दिया|"

"मैं तुझे स्टेशन तक मनाने आया पर तू न माना, तेरे दिल में तो तेरी पत्नी-बच्चों का ओहदा मुझसे अधिक हो गया रे छोटे|"
थोड़ा सांस लेते हुए रुके फिर बोले - "अरे तेरी पोती क्या मेरी ना थी| उसे मैंने जो कहा उसकी भलाई के लिए ही तो कहा न|"

"मैंने शादी नहीं की| सारा प्यार-दुलार तुम पर,अपने बच्चों, फिर नाती-पोतो में ही तो बांटा न मैंने| तो क्या मुझे इतना भी हक ना था|" छाती सहलाने लगे जैसे प्राण बस निकल ही रहे थे उसे सहेज रहे हो थोड़ी देर को|

"जा छोटे जहाँ भी रह सुखी रह| तुझे मुझसे बिछड़ने का दुःख भले ना हो, पर मैं अपने इन निरछल आंसुओ का क्या करूँ जो रुकतें ही नहीं हैं |"
"एक ना एक दिन तू इन आंसुओ की कीमत को समझेगा पर तब तक ......| हो सके तो मेरे अर्थी को कन्धा देने जरुर आना छोटे...मेरे ऋण से मुक्त हो जायेगा|"

चिठ्ठी पढ़ते ही वर्मा जी फफकते हुए रो पड़े| सुबकते हुए बोले भैया आप सही थे गलती मेरी ही थी| मैं बहू के बहकावे में आ गया| आपकी बात सुन लेता तो आपकी पोती को लिव-इन-रिलेशनशिप के दर्द से बचा पाता| उसके बहके कदम वापस तब आए जब पाँव में छाले हो गए |"  सविता मिश्रा

Thursday, 4 September 2014

~दो जून की रोटी~


भूख से बिलबिला रहा था गुल्लू ,पर किसनी के पास उसके पेट की आग़ को बुझाने के लिए फूटी कौड़ी भी ना थी|
आंचल का दूध तो अब सुख चूका था| नन्हा गुल्लू फिर भी चूस रहा था! खुद को बेचने को भी मजबूर हो चुकी थी किसनी| उससे भी पूरी कहाँ हो रही दो जून की रोटी की कमी | बिकने वाली चीज सस्ती जो आंकी जाती है|

आंख में पानी भरा रहता था, जो रह-रह छलक जाता था | तभी एक दलाल की नजर पड़ गयी उस पर| उसने बोला - "किसनी, क्यों न इसे किसी अमीर परिवार के हवाले कर दें ? वहां खूब आराम से रहेगा | वह बच्चे की तलाश में है, तू कहे तो बात करूँ?" आशा भरी निगाहों से देखता हुआ बोला

सुनते ही किसनी ने सीने से चिपका लिया गुल्लू को! दिल के टुकडे को कैसे अलग करने की हिम्मत जुटाती! आखिर उसी के लिए तो जी रही थी वह|
"मेरा यही सहारा है, ये चला जायेगा तो मर ही जाउंगी मैं तो|" ममता में तड़प कर बोली|

दलाल के खूब समझाने पर उसके भविष्य के खातिर आख़िरकार किसनी राजी हो गयी| शर्त भी रखी कि 'उस घर में वो लोग नौकरानी ही सही उसे जगह दे तब'|

आज किसनी को भर पेट भोजन मिलने लगा तो छाती में दूध भी उतरने लगा। परन्तु गुल्लू को अब छाती से लगाने को तरस जाती किसनी। अब गुल्लू अपनी नयी माँ की गोद में दूध की बोतल लिए चिपका रहता।
सविता

http://www.rachanakar.org/2014/11/blog-post_294.html रचनाकार वेब पत्रिका में छपी हुई |

4 September 2014 नया लेखन ग्रुपमें लिखी हुई |
थोड़े चेंज के साथ



Wednesday, 3 September 2014

~दिखावा ~ यमुना किनारा का सुधरा रूप

मन का चोर -

शीला भूख से बिलखते अपने बेटे के लिए मैगी बनाने जा ही रही थी कि जेठानी ने टोंका, "अरे जानती नहीं हो! जवान भतीजे की मौत हो गयी है| ऐसी खबर सुनकर, उस दिन घर में आग नहीं जलाई जाती है| उसे दूध दे दो |"
शीला गोद में बैठाकर बेटे को दूध पिलाने लगी|
"अच्छा सुनो, शीला मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ | कुछ शांति मिलेगी, मन बेचैन हो उठा है यह सुनकर||"
शाम ढल चुकी थी| शीला का पति भतीजे की शैतानियाँ सुना सुनाकर दुखी हुआ जा रहा था| तभी जेठ और जेठानी हँसते-खिलखिलाते हुए आ गए |
जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, "लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला, सबको काट कर दे दो|"
शीला कभी अपने भूखे सो गए बच्चे को देखती तो कभी घड़ी की ओर|
"अरे जानती हो शीला, यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ही न चला|"
"हाँ दी क्यों पता चलेगा! दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा है!" शीला दुखी हो बोली|
"तुम्हारे जेठ की चलती तो अब भी ना आते| कितनी शांति मिल रही थी वहां | मैंने ही कहा कि चलो सब इन्तजार कर रहे होंगे..|"
"दीदी, साड़ी पर चटनी का दाग़ लग गया है|"
सुनते ही चेहरा फ़क्क पड़ गया| बोलीं - "इस बंटी ने लगा गिरा दिया होगा| फ्रीज से चटनी निकालकर चाट रहा था बदमाश|"
"परन्तु दीदी, चटनी तो कल ही .. "
"तू कुछ खाई कि नहीं ! आ ले आ आम काट दूँ, तुम सब लोग खा लो| मुझे तो ऐसे में भूख ही न लग रहीं |" सविता मिश्रा , आगरा


माँ, माँ होती है --



मेरा रोम-रोम करे व्यक्त आभार

माँ का कोई दूजा नहीं है आधार ।

माँ आखिर माँ होती है
हमारे लिए ही जागती 
हमारे लिए ही सोती है 
कलेजे के टुकड़े को अपने
लगा के सीने से रखती है
आफत आये कोई हम पर तो 
स्वयं ढाल बन खड़ी होती है ।

आँखे नम हुई नहीं कि हमारी
झरने आँसुओ के लगती है बहाने
होती तकलीफ गर हम को तो
माँ बदहवास सी हो जाती है।

पिटना दूर की बात है
कोई छू भी दे तो
उसके सीने पर ही 
चलती जैसे कुल्हाड़ी 
चोट हमको आये तो
कमजोर माँ भी दहाड़ देती है ।

हर एक गलती पर अक्सर वह
फेर देती हाथ प्यार से सर पर हमारे 
समझाती दुलार कर, डांटती भी है
भला हो हमारा जिसमें
काम हर वहीं करती है
आँचल में छुपा हमको सो जाती है
ज्यादा प्यार में भी माँ रो जाती है ।

दिए जख्म दुनिया के हृदय में छुपा
हमें उस ताप से सदा दूर रखती है 
बुरी नजर से बचा कर चलती है
आँखों से ओझल कभी नहीं करती है ।

मेरे बार बार करवटें लेने से भी
वह परेशान होती है
गुस्सा होने पर भी वह
हाथ पैरों में आके तेल मलती है ।

किन शब्दों में करूँ मैं बखान उसका
ब्रह्माण्ड में सानी नहीं है जिसका.....।।
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

बधाई


कितनी अजीब बात हैं हम अपनी एक छोटी सी सुई भी संभाल कर रखतें हैं और दूजों के घर को ख़ाक करने से भी नहीं हिचकतें ...वाह री दुनिया वाले कब समझोंगें आप सब दूसरों का दर्द .....खैर भगवान गणेश आप सभी के परिवार में सुख समृधि के साथ पधारे एवं आप सभी की मनोकामनाये पूर्ण करे और थोड़ी सी बुद्दी भी दे जैसे आप दूजों का नुकसान करने से पहले हजार बार सोचें आखिर बुद्धि के देवता हैं|सविता मिश्रा

Friday, 29 August 2014

लगाव (लघु कथा )


"बुढऊ देख रहे हो न, हमारे हँसते-खेलते घर की हालत!" कभी यही आशियाना गुलजार हुआ करता था! आज देखो खंडहर में तब्दील हो गया है|"
"हाँ बुढ़िया, चारो लड़को ने तो अपने-अपने आशियाने बगल में ही बना लिए है! वह भला क्यों यहाँ की देखभाल करते|"
"साथ रहते तो देखभाल करते न" चारो तो आपस में लड़-झगड़ अलग-अलग हो गये|
उन्हें क्या पता उनके माता-पिता की रूह अब भी भटक रही है! यही खंडहर में वे अपने लाडलो के साथ बीते समय को भुला, भला कैसे यहाँ से विदा होते! दुनिया से विदा हो गये तो क्या?" लम्बी सी आह भरी बुढ़िया की आवाज गूंजी
"और जानते हो जी, कल इसका कोई खरीदार आया था, पर बात न बनी चला गया! बगल वाले जेठ के घर पर भी उसकी निगाह लगी हुई थी|"
"अच्छा ! बिकने तो न दूंगा, जब तक हूँ .....!" खंडहर से गड़गड़ाहट की आवाज गूंज उठी वातावरण में|
"शांत रहो बुढऊ, काहे इतना क्रोध करते हो| "
"सुना है वह बड़का का बेटा शहर में कोठी बना लिया है! अपने बीबी बच्चों को ले जाने आया है ...!"
"हां बाप बेटे में बहस हो रही थी ..! अच्छा हुआ, हम दोनों समय से चल दिए वरना इस खंडहर की तरह हमारे भी .....|" ++ सविता मिश्रा ++

Monday, 25 August 2014

सिसकियाँ

माँ  के कमरे से खूब रोने चीखने की आवाजें आ रही थी, १४ साल की राधा भयभीत हो रसोई में दुबकी रही, जब तक पिता के बाहर जाने की आहट ना सुनी ! बाहर बने मंदिर से पिता हरी की दुर्गा स्तुति की ओजस्वी आवाज गूंजने लगी! भक्तों की "हरी महाराज की जय" के नारे से सोनी की सिसकियाँ दब गयी! पिता के बाहर जाते ही माँ से जा लिपट बोली "माँ क्यों सहती हो?" सोनी घर के मंदिर में बिराजमान सीता की मूर्ति देख मुस्करा दी! अपने घाव पर मलहम लगाते हुए बोली, "मेरा पति और तेरा पिता हैं, तू बहुत छोटी है, नहीं समझेगी|"................सविता मिश्रा

Saturday, 23 August 2014

कृष्ण कन्हईया


"कृष्ण कन्हईया जन्म लेने वाले है रे कलुवा तोहरे घरवा में ता, कुछ मिठाई-उठाई खिलावय क इंतजाम बा की नाही|" 
"का मालिक अब आपहु शुरू होई गयेंन सबन की तरह|" "उ ता उप्पर वाले का मर्जी हयेह, हम थोड़व कुछ करा|" कलुवा की बात सुन सब ठहाक
ा लगाने लगे|
"बाबू- बाबू" बदहवास हालत में कलुवा का बेटा चिल्लाता हुआ आया|
"का भा रे चिनुवा"
बाबू- माई",
"का भा तोरे माई के"
"उ माई, 'काकी' कहत बा की बाबू के बोलाय लावा हल्दी, तोहार माई बच्चा जनय के पहिलें ही ....... |"        .............सविता मिश्रा

Friday, 22 August 2014

"भगवान की मर्जी"

=============
विमला मजदूरी कर घर पहुंची तो भड़क गयी भोलू पर, "कमाकर खिलाना नहीं था तो पैदा क्यों किया?"
शराबी भोला "भगवान् की मर्जी कह" बड़ी बड़ी बातें करने लगा|
भगवान सच में बड़ा कारसाज हैं, जिसके घर एक समय का ठीक से भोजन भी नहीं उसके घर हर साल बच्चे| और जिसके घर भण्डार भरा हैं, उसके उप्पर बाँझ का कलंक लगा देता हैं|
शादी के २० साल हो गये थे,सुमिता के घर किलकारी ना गूंजी थी| सुमिता भगवान के किस चौखट पर नहीं पहुंची|
आज यह जोड़ा शराबी भोलू के चौखट पर पहुँच गया| भोला और विमला में खूब बहस हुई पर .....चंद नोटों की गड्डिया ममता पर भारी पड़ गयी|
सुमिता के घर बधाई देने वालो का ताँता लगा था| आज उसकी गोद भर गयी थी, भले कोख सूनी रह गयी थी तो क्या| "भगवान की मर्जी" कह सुमिता ख़ुशी से झूम रही थी|              ...सविता मिश्रा

Tuesday, 19 August 2014

++यमुना किनारा++

गाँव से खबर आई कि पड़ोस के जो की परिजन ही थे उनके बड़े बेटे की मृत्यु हो गयी है|
शीला भूख से बिलखते अपने चार साल के बेटे के लिए मैगी बनाने के लिए स्टोव जलाने जा ही रही थी कि जेठानी ने रोका, "अरे यह क्या कर रही हो जानती नहीं हो ऐसे में कुछ भी नहीं बनता, आज दूध पिला दो रो रहा है तो|"
"अच्छा सुनो 
शीला मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ , वही से कुछ फल-फूल लेती आऊंगी|" शाम ढल चुकी थी, शीला और उसका पति अब भी शोक में ही बैठे मरे हुए भाई के बारे में बात कर रहे थे| जेठ जेठानी हँसते-खिलखिलाते आये, जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, "लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला काट कर सबको दे दो|" 'दो आम और सब' मन में ही सोच रह गयी| शीला कभी अपने भूखे सोये बच्चे को देखती कभी घड़ी की ओर| "अरे जानती हो शीला यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ना चला|"
"हा दी क्यों पता चलेगा" शीला दुखी सी हो बोली, "तुम्हारे जेठ की चलती तो अब भी ना आते, पर मैंने ही कहा कि चलो सब इन्तजार कर रहें होगें...." ....शीला उनकी उतारी साड़ी तह करती हुई बोली अरे दीदी "इस पर कुछ गिर गया है" जेठानी का मुहं उतर सा गया पर संभल कर बोली, "हा तुम तो जानती ही हो लोग कितने बेवकूफ होते है, दोना फेंक दिया था मुझ पर एक ने ." "तुम्हारें भैया तो लड़ जाते मैंने ही रोक दिया" कह हंस कर अपने चेहरे के भाव छुपाने लगी| "...हां दी होते भी है और दुसरो को समझते भी है ........"  जेठानी की चेहरे की रंगत देखने लायक थी|  ..सविता मिश्रा


http://www.rachanakar.org/2014/11/blog-post_294.html रचनाकार वेब पत्रिका में छपी हुई |
१९ अगस्त २०१४ में नया लेखन ग्रुप में |

(अब इसे बदल कर दिखावा शीर्षक से लिखा है )

~दिखावा ~
  (मन का चोर -)
शीला भूख से बिलखते अपने बेटे के लिए मैगी बनाने जा ही रही थी कि जेठानी ने टोंका, "अरे जानती नहीं हो! जवान भतीजे की मौत हो गयी है| ऐसी खबर सुनकर, उस दिन घर में आग नहीं जलाई जाती है| उसे दूध दे दो |"
शीला गोद में बैठाकर बेटे को दूध पिलाने लगी|
"अच्छा सुनो, शीला मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ | कुछ शांति मिलेगी, मन बेचैन हो उठा है यह सुनकर||"
शाम ढल चुकी थी| शीला का पति भतीजे की शैतानियाँ सुना सुनाकर दुखी हुआ जा रहा था| तभी जेठ और जेठानी हँसते-खिलखिलाते हुए आ गए |
जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, "लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला, सबको काट कर दे दो|"
शीला कभी अपने भूखे सो गए बच्चे को देखती तो कभी घड़ी की ओर|
"अरे जानती हो शीला, यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ही न चला|"
"हाँ दी क्यों पता चलेगा! दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा है!" शीला दुखी हो बोली|
"तुम्हारे जेठ की चलती तो अब भी ना आते| कितनी शांति मिल रही थी वहां | मैंने ही कहा कि चलो सब इन्तजार कर रहे होंगे..|"
"दीदी, साड़ी पर चटनी का दाग़ लग गया है|"
सुनते ही चेहरा फ़क्क पड़ गया| बोलीं - "इस बंटी ने लगा गिरा दिया होगा| फ्रीज से चटनी निकालकर चाट रहा था बदमाश|"
"परन्तु दीदी, चटनी तो कल ही .. "
"तू कुछ खाई कि नहीं ! आ ले आ आम काट दूँ, तुम सब लोग खा लो| मुझे तो ऐसे में भूख ही न लग रहीं |" सविता मिश्रा , आगरा


Friday, 15 August 2014

पेट की मज़बूरी


एक बूढ़े बाबा हाथ में झंडा लिए बढ़े ही जा रहे थे, कईयों ने टोका क्योकि चीफ मिनिस्टर का मंच सजा था, ऐसे कोई ऐरा गैरा कैसे उनके मंच पर जा सकता था| बब्बू आगे बढ़ के बोला "बाबा आप मंच पर मत जाइये, यहाँ बैठिये आप के लिय यही कुर्सी डाल देतें है|" "बाबा सुनिए तो" पर बाबा कहाँ रुकने वाले थे|

जैसे ही 'आयोजक' की नजर पड़ी, लगा दिए बाबा को दो डंडे, "बूढ़े समझाया जा रहा पर तेरे समझ नहीं आ रहा" आंख में आंसू भर बाबा बोले "हा बेटा आजादी के लिय लड़ने से पहले समझना चाहिए था हमें कि हमारी ऐसी कद्र होगी|"
"बहु बेटा चिल्लाते रहते हैं कि बुड्ढा कागजो में मर गया २५ साल से ...पर हमारे लिये बोझ बना बैठा है|" तो आज निकल आया पोते के हाथ से यह झंडा लेकर..., कभी यही झंडा बड़े शान से ले चलता था, पर आज मायूस हूँ जिन्दा जो नहीं हूँ  ....|" आँखों से झर झर आंसू बहते देख आसपास के सारे लोगों के ऑंखें नम हो गयी|
बब्बू ने सोचा जो आजादी के 
लिये लड़ा, कष्ट झेला वह .....,और जिसने कुछ नहीं किया देश के लिय वह मलाई ....,छीअ! "पेट की मज़बूरी है बाबा वरना ...|" बब्बू रुंधे गले से बोल चुप हो गया| ..सविता मिश्रा

"माहिया"


१..मेघ हुआ बंजारा
रुक तनिक ठहर जा
बरस हम पर जरा सा

२..कुछ मेरी जुबा सुनो
कुछ कहते खुद की|
कह सुन फिर उसे गुनों|

३..मेघ घिरे जो काले
हो मन मतवाला
वर्षा के संग झूमें|

४..मन की पीड़ा तेरे

सारी हर लूंगी
मुस्करा पिया मेरे|

५..पयोधर की ये घड़ी
झिर-झिर लगी झड़ी
बदरा से धरा लड़ी|

६..बैठ गोद में मेरे
आँचल में लु छुपा
अब तू आँख तरेरे|

७..हँसनें की नहीं घड़ी

सड़क पर जो गिरी
मदद करने को बढ़ी|


८ ..सुख लिखना चाह रही
दु:ख लिख जाता हैं
खुद को फूसला रही|
++ सविता मिश्रा ++

Monday, 11 August 2014

राखी भेजा है

चंद धागों में पिरो निज प्यार भेजा है
अपनी रक्षा के लिए साभार भेजा है|


माना तेरे मन में राखी का सम्मान नहीं
बड़े मान से राखी में दुलार भेजा है|


भाई बहिन का नाता जैसे इक अटूट बंधन है
जार जार होता जाता पर जोरजार भेजा है|


ढुलक गया  मोती मेरी नम आँखों से
गूंथ गूंथ ऐसे मोती का हार भेजा है|


सारे शिकवे गिले भूल सावन में हर बार
बंद लिफ़ाफ़े में यादों का भण्डार भेजा है|


मेरी राखी के धागों का मोल नहीं है भैया
प्यार छुपा कर धागों में बेशुमार भेजा है|


मतलब की दुनिया मतलब के सारे रिश्तें नाते
रखना रिश्तें मधुर यही मनुहार भेजा है|


माना होता अजब अनोखा यही खून का रिश्ता
राखी के तारों में निहित रिश्तों का प्यार भेजा है|


कभी ना फीकी हो मेरे भैया कान्ति तेरे चेहरे की
हरने को सारे गम तेरे माँ सा दुलार भेजा है|
सविता मिश्रा

संस्कार

सुमन बदहवाश सी घटना स्थल पर पहुंची, अपने बेटे प्रणव की हालत देख बिलखने लगी| भीड़ की खुसफुस सुन वह सन्न सी रह गयी, एक नवयुवती की आवाज सुमन को तीर सी जा चुभी "लड़की छेड़ रहा था उसके भाई ने कितना मारा, कैसा जमाना आ गया ......|" "अरे नहीं, 'भाई नहीं थे', देखो वह लड़की अब भी खड़ी हो सुबक रही है" बगल में खड़ी बुजुर्ग महिला बोली  ....यह सुन सुमन का खून खौल उठा,  और शर्म से नजरें नीची हो गयी,  प्रणव पर ही बरस पड़ी "तुझे क्या ऐसे 'संस्कार' दिए थे हमने करमजले, अच्छा हुआ जो तेरे बहन नहीं है| प्रणव  ..."मम्मी सुनो तो मैंने ....!" पर सुमन बड़बड़ाती उस लड़की की तरह जाकर बोली "बेटी माफ़ करना, ऐसा नहीं हैं वह, बस संगत आजकल गलत हो गयी है उसकी, बहुत शर्मिंदा ...."  "नहीं नहीं आंटी जी उसकी कोई गलती नहीं वह तो मुझे बचा रहा था, उसके साथ जो लड़के थे उन्होंने ही आपके बेटे की यह हालत की, सब भीड़ देख भाग खड़े हुए वर्ना ना जाने क्या होता...!" लड़की सुबकते हुए बोली| 
सुन अचानक गर्व हो आया अपने बेटे पर|  बेटे के पास जा उसका सर गोद में रख "हमें माफ़ कर देना मेरे बच्चे, हमने कैसे समझ लिया कि मेरा आदर्श बेटा ऐसा कुछ कर सकता है" बिलखते हुए बोली  "तुझे समझाती थी न कि संगत अच्छी रख, देखा अब|"   "कोई अम्बुलेंस बुलाओ" चीखने लगी सुमन, अब उसकी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे|  "संस्कार चाहे जितने भी अच्छे हों  बुरी संगत का फल तो भोगना ही पड़ता है" तेरी यह बात गाँठ बाँध ली मैंने, अब बुरी संगत छोड़ दूंगा  माँ" .सुन गर्व से सुमन का सर ऊँचा हो गया था|.....सविता मिश्रा

Friday, 8 August 2014

~प्यासी धरती माँ ~

सुमी पानी का गागर दूर पोखर से भर ला रही थी, उसकी छोटी बहन चिक्की भी उसके साथ थी उसे गर्मी में नंगे पैर चलने के कारण पैरो में जलन हो रही थी और गला-ओंठ भी प्यास से सूखे जा रहे थे| पैरों से जमीं की और सर पर धूप की तपिश उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी|
प्यास तो सुमी को भी लगी थी, पर वह थोड़ी बड़ी थी, सहने की आदत पड़ गयी थी उसे|
चिक्की चिल्लाई..." दीदी बहुत जोरो से प्यास लगी है, पानी भरी भी हो, फिर भी ना पी रही हो ना पिला रही हो|" "अरे छुटकी तू समझती क्यों नहीं ऐसे पानी गागर से पियेगें तो बहुत सा पानी बर्बाद हो जायेगा" सुमी चिक्की को समझाने के अंदाज में बोली|
"अरे दीदी बर्बाद क्यों होगा, एक तो हमारी प्यास बुझेगी, दूजे इस सूखी-फटी धरा को भी पानी मिल जायेगा, देखो मुहं बाए पानी मांग रही है| जब हम अपनी माँ के लिय इत्ती दूर से पानी भर ला सकतें है, तो अपनी धरती माता को  खुद ही को लाभ पहुँचाने के लिय जरा सा पानी नहीं दे सकते है?" चिक्की सायानी बन बोली|
सुमी बोली ..."अरे छुटकी तू कह तो सही रही है और यह सुखा खेत तालाब के पास भी है, चल-चल दो चार गागर रोज यहाँ भी डालेगें आखिर मेरी धरती माँ क्यों प्यासी रहें भला" ...दोनों ही चल पड़ती है एक नये संकल्प के साथ.....| ...सविता मिश्रा

प्रकृति संपदा (कहानी )

माँ अपनी दोनो बच्चियों को पानी भरने में लगा देती| गरीबी के कारण स्कूल तो जाती नहीं थी दोनो |  खुद घर का और काम निपटाने में लग जाती| गाँव से दूर एक नहर थी, वहां से बड़ी बिटिया निक्की गगरा में पानी भर कर लाती| ज्यादा बड़ी ना थी, पर अपनी उम्र और जान से दुगुना काम कर लेती थी | छुटकी उसकी संगत के कारण जाती और वहां नहर में खूब  मौज  भी करने को मिल जाता | अतः खुशीखुशी बड़ी  बहन के साथ हो लेती | दोनो नहर में घंटो मस्ती करते, फिर गगरा में पानी भर घर आ जाते| दिन में कई चक्कर लगाते और हर बार पानी देख बेकाबू हो कूद पड़ती छुटकी | नहर में मस्ती करने  में  बड़ा  मन लगता |  साँझ ढ़लने तक पानी ही भरती रहती  दोनो |  घर आते ही डांट खाती  तो खिलखिला हंस पड़ती | मस्ती में काम भी खूब कर लेती  दोनो, अतः माँ को ज्यादा शिकायत ना होती|

एक दिन गाँव में सुखा ग्रस्त इलाके में दौरा करने वाली टीम आई, उसने गाँव वालो को समझाया- "आप लोगो के परदादा ने पेड़ लगाया, आप अब तक फायदा लेते आये | फिर अब आप सब भी क्यों नहीं लगाते पेड़? आपके पास तो इतनी जमीने खाली पड़ी है? बहुत सी जमीने तो खेती लायक भी नहीं है | उसी जमींन पर आप मेहनत कर पेड़ उगाये, देखिये साल दो साल में ही आप धनवान हो जायेगे| .प्रकृति संपदा से बढ़ कर भी कुछ है क्या?"

निक्की बड़े ध्यान से बात सुन रही थी, दुसरे दिन जब वह नहर पर पानी लेने गयी तो वहाँ  नीम के कई पौधे उगे हुए थे | कुछ पौधे वह उखाड़ कर छुटकी को पकड़ा दी | बोली "ले छुटकी पकड़ और हा संभल कर पकड़ना | ज्यादा कस कर मुट्ठी ना बाँध लेना |"
"पौधे मर जायेगे न" छुटकी बड़ी गंभीरता से बोली|
"हाँ निक्की दीदी, मैंने भी सुना था, वो चच्चा कहें थे कि पौधे बहुत नाजुक होते है|"
घर आते ही निक्की बोली  "बाबा देखो मैं क्या लायी ? इसे लगाना है अपने घर के पास" और खुरपी ले चल पड़ी! पहले तो रामसुख झल्लाया, पर फिर खुद ही लग गया गड्ढा खोदने|
दस दिन में ही घर के आस पास आठ-दस पेड़ लगा दिए| समय के साथ पेड़ थोड़े बड़े हो गये| एक दिन पास में निक्की खड़ी हो चिल्लाई "बाबा , अम्मा, देखो-देखो यह तो हमसे भी बड़ा हो गया"| उसको बढ़ता देख पूरा परिवार खुश और आश्वस्त था कि मेरे बच्चे सूखे की मार नहीं झेलेंगे|
उसकी देखा-देखी अब पूरा गाँव मिलकर बंजर भूमि पर मेहनत कर आम, इमली, महुवा केढेरों पेड़ लगा दिए | अब तो उनकी देख रेख में पेड़ लहलाहा रहे थे| ...सविता मिश्रा

Monday, 4 August 2014

"हार"


=====
रोहित गाँव पहुँचने के दो घंटे बाद ही, बहुत  खुश हो अपनी प्रिंसिपल पत्नी को फोन करता है ..."स्वीट हाट, अम्मा मान गयी, उसे कल ही लेके मैं आ रहा हूँ|  वह "कमला वाला कमरा" जरा साफ़ करा देना, और हाँ स्टोर रुम में  जो पिताजी की  तस्वीर फेंक दी थी जो तुमने वह पड़ी होगी कहीं, उसे खोज कर  उस पर सुंदर सा "हार" जरुर चढ़ा देना|" " इतना तो कर सकती हो न मेरे लिय, 'प्लीज' ....." |  बेटे की बात सुन के सुषमा की आँखों से झर-झर आंसुओ की धारा बहने लगती है, पर पोते को देखने की ख़ुशी में  कपड़ें लत्तें  की एक गठरी बांध लेती हैं |

मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है, करें भी क्या बेचारी|   खुद की आत्मा को टांग देती है दीवार पर लटकती अपने पति की तस्वीर पर "हार" की तरह,  रुआसें स्वर में कहके  कि "देखो मैं अपनी आत्मा तुम्हारे ही पास छोड़ रही हूँ, तुम्हारा ख्याल रखने के लिए"|  ....उसे अहसास है कि उसकी आत्मा साथ रही, तो वह दो पल भी नहीं ठहर पाएगीं अपनी बहु सीमा के पास|  बहु के पास रहने के लिय उसे अपनी आत्मा को अपनी  कुटीया में ही छोड़ना होगा ....|  आंसुओ को दिल के कोने में दफन कर स्वार्थी बेटे के साथ अगली सुबह  चल देती है शहर की ओर .......|..सविता मिश्रा

Friday, 25 July 2014

परिवेश (लघु कथा )



नन्ही सी बच्ची ऊपर से साल भर के बच्चे का बोझ; दया सी आई| अपने बच्चो के लिय पर्स में चाकलेट थी, जब नीलम ने उन दोनों को देनी चाही तो लड़की सकुचाई, नाम पूछते हुए नजरों से ही आग्रह किया, उसने शरमा कर " 'बिनुई' चाकलेट लेते हुए बोला " और "इस नन्हे का? तो बोली लालू"|
"लो बेटा" कह जब लालू को देने लगी तो उसकी नजर सारे चाकलेट पर गड़ी रही| नीलम ने उसे चारो चाकलेट दे कहा "एक-एक खाना वरना ये तुम्हारे चार नन्हे दांत ख़राब हो जायेगें"| नीलम मुस्करा कर वहाँ से चली आई ;पर आँखों के सामने वही बच्चे तैर रहे थे|
हिमा को आवाज लगा बोली "बेटा वह सब्जी का थैला जो लायी हूँ, यहाँ ले आओ| छांट ले सब्जी" | बिटिया तुनक कर बोली "मम्मी मुझसे नहीं उठ रहा तुम खुद ले लो न" |
नीलम को आज ना जाने क्यों गुस्सा आ गया "तू दस साल की है और तुझसे चार किलो का थैला नहीं उठ रहा, और गरीब बच्चों को देख, वह चार पांच साल में ही कितना भारी-भारी बोझा उठा लेते है| अपने से दूना वजन उठा, कितनी-कितनी दूर चले जाते है, बिना चेहरे पर शिकन लाये|" "मम्मी आप ऐसा है न, यह लिक्चर न पिलाया करो रोज-रोज"| "जरुर कुछ ऐसा देखकर आई होगी आप | हम जो कर लेते है वह कर सकते है क्या ?" ...कह वह मगन हो गयी टीवी देखने में|
नीलम सोच में पड़ गयी| सही तो कह रही है हिमा! जिसको जैसे परिवेश में पालेंगे वैसे ही तो बनेगा| 'क्या वह बच्ची हिमा की तरह पढ़ सकती है' 'अंग्रेजी फटाफट बोल सकती है, नहीं न'|
"मैं भी न" कह नीलम खुद ही खुद पर हंस सब्जी का थैला ले बैठ गयी .....| सविता मिश्रा

नींव की ईट (kahani)

श्याम बहुत ही होनहार छात्र था| सभी शिक्षक उसकी इतनी तारिफ करते कि माँ बाप का सीना ख़ुशी से फूल जाता था | धीरे-धीरे समय बीतता रहा अब श्याम कक्षा नौ में आ गया था| माँ को उस पर बहुत भरोसा था ,अतः ज्यादा ध्यान नहीं देती थी| राजेश के पढ़ने पर टोकने पर कहती -"बच्चा है खेलने खाने की उम्र है| ज्यादा जोर पढाई पर मत दिया करिए...|" लेकिन राजेश उसे कमरे में पढ़ता हुआ देख खुश हो जाता |

राजेश तो कक्षा आठ में ही उसके क्लास में प्रथम आने से खुश हो गए थे | और एक अच्छा सा मोबाईल लाकर उसे उपहार में दे दिया था | इस विश्वास पर कि वह इसी तरह अपनी मेहनत जारी रखेगा| वह भटक जायेगा, यह बात दिमाग़ में लाये ही नहीं थे| पर मोबाईल हाथ में आते ही वह पढाई के मार्ग से भटक गया था | अब माँ-पापा जब भी कमरे में आते| उन्हें श्याम पढ़ते दीखता| पर उन्हें क्या पता था कि श्याम तो धोखा दे रहा है| उनकी नजर बचाकर वह अब ह्वाट्सअप पर चैटिंग और नेट पर गेम खेलने में ही दिनभर लगा रहता है|

उसको पढ़ता देख उसकी मेहनत से दोनों आश्वस्त थे कि इस बार भी टॉप करेगा उनका बेटा| पर इस बार सब उल्टा हुआ, जब रिजल्ट लेने स्कूल पहुंचे | शिक्षको ने शिकायतों का पुलिंदा जैसे तैयार रखा था| एक एक कर सभी ने शिकायत कर डाली और हिदायत दी कि "आप श्याम पर अधिक ध्यान दें | बढ़ता हुआ बच्चा है, हाथ से निकल गया तो बहुत मुसीबत होगी| आपके ही भले के लिए कह रहे हैं , बुरा ना मानियेगा|"
हाथ में रिजल्ट जैसे ही आया राजेश के पैरो के नीचे से जैसे जमीं खिसक गयी, माँ को भी काटो तो जैसे खून ही नहीं, दोनों आवक रह गये| श्याम सारे विषयों में फेल था|
राजेश को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने शिक्षक से कहा "आप चिंता ना करें अगली बार मेरा यही बेटा, पहले जैसा करके दिखाएगा"|
घर पहुँचते ही श्याम को राजेश ने बुलाया, श्याम डर गया कि आज तो खैर नहीं पापा बहुत मारेगें, पर राजेश ने कुछ नहीं किया बस समझाया, "कि जिन्दगी राह इसी उम्र में मजबूत होती है, इस कड़ी को कमजोर कर दोगें तो, भविष्य की राह बहुत कठिन हो जाएगी बेटा|"
"यूँ समझो कि तुम्हारें लिए नींव की ईट है यह समय|"
श्याम की समझ आ गया उसने खुद ही अपना मोबाइल पापा को देते हुए बोला - "पापा भटकाव की जड़ है यह| इसे आप रखिये और जब मैं पढ़ -लिखकर आप की तरह गजटेड अफसर हो जाऊँगा तो आपसे, इससे भी अच्छा मोबाइल मागूँगा|" यह कह श्याम अपने कमरे में जाकर अपनी पढ़ाई करने लगा| राजेश उसकी कामयाबी के प्रति आश्वस्त हो नीलू की तरफ देख मुस्करा दिया |...सविता मिश्रा

समय रहते


=======
भटकाव अनगिनत
भटक तुम ना जाना

तुम बच्चे बड़े सयाने
कही लटक ना जाना
इतने सारे लुभाने
गजेट्स है आये
राह भटकावन की
बड़े जोर शोर से
तुम्हें ये दिखलाये
इन लुभावनी चीजो में
पढ़ाई को भूल ना जाना
खेल-कूद कर भी तो
शरीर को बलिष्ठ बनाना
बैठे बैठे गजेट्स में
रहोगे जो उलझे
भविष्य की डोर
उलझ के रह जायेगी
ये लुभावने वादे कर
तुम्हे खूब भरमायेगी
भ्रम में फंसे जो तुम
सुलझाने की उम्र तुम्हारी
फुर्र से निकल जाएगी
अतः समय रहते ही
जिन्दगी को सुलझाओ
मन को ऐसे मत
भ्रम जाल में भटकाओ| ..
.सविता मिश्रा

Sunday, 20 July 2014

सठिया गयी हो -

शहर के बीचोबीच खूब बड़ा पार्क था। आसपास की बिल्डिंगों से ही नहीं बल्कि थोड़ी दूरी पर रहने वाले लोग भी पार्क की सुन्दरता के कारण सुबह-शाम खिंचे हुए चले आते थे। शहरवासियों के लिए वह पार्क आकर्षण का केंद्र था। हर तरह के फूल के पौधे मौजूद थे पार्क में। बेला, चमेली और रातरानी के पौधे बहुतायत में थे। उनकी तीखी महक बड़ा सुकून देती थी। नीम के पेड़ की खुशबू बरसात में तो बड़ी सुहावनी लगती थी। कई फलदार पेड़ भी थे जिनके नीचे बड़े-बड़े चबूतरे बने हुए थे। बड़े-बुजुर्ग वहां पर आकार रोज ही मजमा लगाते थे घंटो बैठकर। कई बुजुर्ग बरगद के पेड़ के नीचे योगाभ्यास करते दिख जाते थे।
रामप्रसाद भी अपनी पत्नी संगीता के साथ कभी-कभार आ जाते थे। दोनों बेटे विदेश में जाकर बस गये थे। अब इस शहर में रामप्रसाद और संगीता ही एक दूजे के सुख-दुःख के साथी थे। रामप्रसाद को इस पार्क में आकर बैठना बहुत ही ज्यादा पसंद था। वे जब भी आते, दो-चार घंटे पार्क में ही बिता देते थे। संगीता को पार्क में टहलने से ज्यादा अड़ोस-पड़ोस के घरों में जाकर बैठकी करना पसंद था।
आज रामप्रसाद जिद कर संगीता को लेकर आये थे। पार्क में आकार एक किनारे पड़ी बेंच पर दोनों बैठ गए थे। वहां पार्क में कई नवजोड़ो को देख न जाने रामप्रसाद को क्या सूझी। अपनी जीवन संगनी के हाथों को अपने हाथ में लेकर बोले, " याद है न ऐसे पहली बार तुम्हारें हाथो को कब हमने हाथ में लिया था ?" संगीता मुस्करा दी बस। क्योंकि उसका सारा ध्यान तो पार्क में एक तीन साल के बच्चे के साथ टहलती हुई गर्भवती युवती की ओर था। उसे देख उसके मन में अजीब-अजीब ख्याल आ रहे थे।
वह सोच रही थी यह युवती तो 'पूरे दिन' से है, यहाँ अकेले कैसे टहल रही है ? वह भी तीन साल के नन्हे बच्चे के साथ। जरुर पति ने छोड़ दिया होगा। तभी तो इस हालत में भी वो, यहाँ अकेले टहल रही है। सास-ससुर को तो आज की जनरेशन बोझ मानती है, भेज दिया होगा उन्हें वृद्धाश्रम। न जाने क्या हो गया है आज की जनरेशन को। सास होती तो इसको ऐसी हालत में थोड़ी टहलने अकेले भेजती ! खुद साथ रहकर बच्चे के साथ बहू का भी इस हालत में ध्यान रखती। होगी ये खूब नकचढ़ी ! तभी तो अब देखो कोई नहीं है इसके साथ।
यह भी हो सकता है यह अकेले रहती हो। आजकल तो बहुएँ आते ही एक नया अलग घरोंदा बसा लेती हैं। हो सकता हैं लड़ बैठी हो अपने पति से। आज की लड़कियां सहना कहाँ सीखी है। हर बात में तो पति को जबाब देने लगती हैं। नहीं सहा होगा इसके मर्द ने। इस हाल में छोड़ जाने का मतलब ही है कि लड़की लड़ाकू किस्म की हैं। एक बात भी सहती न होगी | हमारा जमाना था कितना कुछ सहते थे , उफ़ तक ना करते थे कभी | तभी तो आज तक एक साथ है |
ठंडी हवा का झोंका आया तो फूलों की सुगंध से मुग्ध सी हो गई संगीता। हवा में फूलों की ताजगी उसके दिमाग को भी तरोताज़ा कर गयी थी। आँखों को भी हवा में मौजूद शीतलता ने शीतल कर दिया था। एक बारगी वह खुद से खुद को ही झकझोरती हुई बोली- 'अरे नहीं, नहीं मैं गलत क्यों सोच रही हूँ | मैं भी तो जब ये आँफिस से देर से आते थे, अकेले पार्क में टहलती थी। उस समय रिंकू पेट में था और डाक्टर की शख्त हिदायत थी कि मैं रोज टहला करूं।
और उस दिन इसी तरह टहलते हुए पार्क में ही तो मेरा दर्द शुरू हो गया था। मैं सुस्ताने के लिए पास पड़ी बेंच पर बैठ गई थी। वहीं बेंच पर बैठी एक बुजुर्ग महिला ने मेरी मदद की थी | इन्हें भी उन्होंने ही मेरे फोन से फोन कर बुलाया था। अपना वह दिन इतनी जल्दी भूल गयी। सच कहते है ये, मैं 'सठिया' गयी हूँ|'
शादी के एक साल के अंदर ही इनकी नौकरी शहर से बाहर लग गयी थी। सास ने जबरजस्ती मुझे भी इनके साथ भेज दिया था , यह कह कि मेरे बबुआ को भोजन कौन बनाकर देगा। ऑफिस से थक हार कर आएगा, तो क्या भोजन खुद बनाएगा ! इनके बहुत मना करने के बावजूद 'बहू तैयार हो जा बबुआ संग जाने को' कहकर उन्होंने सख्ती से आदेश पारित कर दिया था। पुराने दिन याद आते ही उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान तैर गयी।
उसे हँसता हुआ देख कर राम प्रसाद ने कहा, " मन ही मन क्या सोच कर खिलखिला रही हो !" संगीता के अनसुना कर देने पर आगे बुदबुदाया, " ये बुढ़िया जाने कहाँ खोयी है ?" पर सुनीता तो पास होकर भी पास कहाँ थी , वह तो दूर युवती में खुद को देख अपने खट्टे मीट्ठे दिनों में खो गयी थी।

युवती अब भी पार्क में धीरे-धीरे टहल रही थी। थोड़ी ही दूरी पर उसका बेटा तिपहिए पर उसके पीछे पीछे चल रहा था। अचानक बीटा किसी पत्थर से टकरा कर तिपहिये से गिर गया। गिरते ही वह बड़े तेज स्वरों में रोने लगा। रोने का स्वर जैसे ही संगीता के कानों में पड़ा वह वर्तमान में वापस लौट आई। उसने दौड़ कर बच्चे को उठाकर चुप कराने लगी। युवती जल्दी नहीं दौड़ सकती थी। धीरे-धीरे चलते हुए व्वह जब तक पास आई, उसका बेटा संगीता की गोद में मुस्करा रहा था। संगीता ने लाड़ करके बच्चे को बहला लिया था | युवती ने सुनीता को 'धन्यवाद आंटी' कहा और मुस्करा दी।

वे दोनों जब तक एक दूसरे से जानपहचान कर रहे थे तभी युवती संध्या का पति राकेश वहां आ गया। वह हंसते हुए संध्या से बोला, "डार्लिंग, माफ़ कर दो, आज देर हो गयी। बात ऐसी थी कि बॉस ने कुछ काम दे दिया था। और साथ में सख्त हिदायत दी कि इसको निपटाए बिना घर मत जाईएगा। बोलो, मैं क्या कर सकता था ! तुम तो जानती हो कि बॉस की तो सुननी ही पड़ती हैं। घर पंहुचा तो माँ चिल्ला पड़ी कि बहू अकेले गयी है पार्क, जा ले आ; मेरे घुटनों में दर्द था इसलिए जा नहीं सकी। तू जल्दी भाग के जा।"

संध्या मुस्कराते हुए पति से बोली, "कोई बात नहीं स्वीटहार्ट |" चिंटू अब भी मेरी गोद में बैठा था। मेरे पास आकर संध्या ने पति से मेरा परिचय कराया, "इनसे मिलो, ये संगीता आंटी हैं। इन्होंने ही चिंटू को आज सम्भाला।" राकेश ने 'नमस्ते आंटी' कह कर अपने बेटे चिंटू को गोद में लिया और संध्या का हाथ पकड़ बतियाते हुए घर की ओर चल पड़ा।

संगीता अपने बुढ़ऊ को अपनी सोच बता-बताकर खुब हंसी। बुढ़ऊ हमेशा की तरह हँसते हुए बोले, "तुम न सच में सठिया गयी हो।" कह दोनों ही ठहाके लगाने लग पड़े।

बुढ़िया हँसते-खेलते युगल को दूर जाते देख बोली, " सच में सठिया गयी हूँ' मैं|" अन्धेरा होने लगा था अतः दोनों बूढ़ा-बुढ़िया भी एक दूजे का सहारा बन घर की ओर चल पड़े, अपने खट्टे मीट्ठे अनुभव एक दूजे से बाँटते हुए।....सविता मिश्रा
**************************************

Monday, 16 June 2014

हायकु

१--तम हटाता
पथ प्रदर्शक
पिता हमारा|


२--स्नेह अपार

चुकाए कैसे कर्ज
भाग्य विधाता


३--उऋण कहा
कित्ती भी सेवा करो
पितृ ऋण से|

४--सजल नैन
उठाए डोली कहार
पिता लाडली|

५--द्युति पिता की

फैली चहुँ दिशाएं
मैं रत्ती भर|
  ....
.सविता मिश्रा

हायकु

१--तम हटाता
पथ प्रदर्शक
पिता हमारा|


२--स्नेह अपार

चुकाए कैसे कर्ज
भाग्य विधाता


३--उऋण कहा
कित्ती भी सेवा करो
पितृ ऋण से|

४--सजल नैन
उठाए डोली कहार
पिता लाडली|

५--द्युति पिता की

फैली चहुँ दिशाएं
मैं रत्ती भर|
  ....
.सविता मिश्रा

हायकू


१--तम हटाता
पथ प्रदर्शक
पिता हमारा|


२--स्नेह अपार

चुकाए कैसे कर्ज
भाग्य विधाता


३--उऋण कहा
कित्ती भी सेवा करो
पितृ ऋण से|

४--सजल नैन
उठाए डोली कहार
पिता लाडली|

५--द्युति पिता की

फैली चहुँ दिशाएं
मैं रत्ती भर|
  ....
.सविता मिश्रा

हायकू ..इंतजार.....बारिश



~~~~~~~~~~~~~
१-हर्षित मन
मंत्रमुग्ध होती मैं
सोंधी खुशबु|

२--फटी दरारे
खून के आंसू रोता
ठगा किसान|

३--कुपित भानु
असहनीय ताप
आस पावस|

४--दग्ध भाष्कर
आलय तप्त हुआ
तरस खाओ|

५--पावस झुमा
पावन हुई धरा
मग्न किसान| सविता मिश्रा

Monday, 2 June 2014

अपना जीवन

जब पापा मेरे लिए दूल्हा निकले खोजने
सुन लड़कों के अरमान मन लगे मसोसने।

कोई बनना चाहता था आई.एस.-पी.सी.एस.
और कोई चाहता था करना एमबीबीएस
बीवी चाहता था बी.ए.-एम.ए. पास
या फिर पद हो उसका कोई ख़ास
छोड़ा पापा ने उस लड़के की आस
क्योंकि मैं थी अभी बस दसवीं पास |
कोई बनना चाहता था बिजनेस-मैन
लगाकर पीले-नीले चश्मे नैन
रख लंबे घने भूरे बाल
चाहता बीवी फैशन-वाल
मान लिया पिता ने पहले तो
बाद में किया लड़के ने फेल जो
यही तो है शादी का एक घिनौना खेल
हर लड़की होती बड़ी इस दर्द को झेल |
काँटों भरे रास्ते पर चलना हुआ था दूभर
बेटी होने का दर्द चेहरे पर आया था उभर।
चाहते थे सास-ससुर घर व लड़का
मिला नहीं कोई कही भी ढंग का
बोले कई नाते-रिश्तेदार
मेरे लड़के से कर दो यार
पापा को नहीं था मंजूर
चाहते थे रिश्ते से दूर
लड़के के बाप को उटपटांग सीखा
किया कुछ अपनों ने ही धोखा
मांगो उनसे लाख-दो -लाख
है एक ही लड़की का बाप ।
दहेज का दानव विकराल हुआ
हर बेटी का बाप कंगाल हुआ।
खोज-खोजकर हुए थक के चूर
छिपा था अभी तक उनका नूर
खोजा प्रतापगढ़, इलाहाबाद एवं जौनपुर
तभी एक दोस्त ने नाम बताया ......पुर
लड़के के चेहरे की देख रौनक
खुशी से आई उनके चहरे पर चमक
गए अपने सारे पिछले दुःख भूल
लड़का मिला ऐसा जैसे गुलाब का फूल |
लाखों में एक है बातें करते
रात भर चैन की नींद सोते ।
पापा ने की ऐसी वाणी ईजाद
है पुलिस आफिसर
रहा ना किसी को याद
हुई दोनों जन में कुछ गहमा-गहमी
लड़के के पिता ने भर दी हामी
हो गयी अपनी तो सगाई
ससुर-जेठ एवं ननद जी आई
चढ़ गया तिलक एवं वरक्षा
पास हुई थी मैं बारहीं कक्षा ।
भटकते द्वार द्वार हुए थे वह पसीने पसीने
आज बजने के दिन आये थे ढोल-मंजीरे।
शादी की तारीख नजदीक आई
होने वाली थी अब मैं अपनों से पराई
पापा ने कहाँ-कहाँ नहीं मेरी किस्मत आजमाई
आज उनके लिए भी खुशी की थी आंधी आई|
गयी अपनों से बिछुड़
जा गयी अनजानों से जुड़
पढ़ाई से शुरू हुई उनकी बात
पता ही ना चला कब हो गयी प्रभात
हर दिन-रात भय बहुत था लगता
आ जाती पापा-मम्मी की याद सता ।
माँ-बाप की छोटी सी गुड़ियाँ हो गयी थी बड़ी
ससुराल की दहलीज पर जैसे ही वह हुई खड़ी।
आता है अब अतीत का ख्याल
शादी को बीत गया है एक साल |
माता-पिता का हुआ था बोझ हल्का
मिल गया था बेटी के लिए दूल्हा मन का|
हर लड़की के जिन्दगी का है यही सार
मन को मारना पड़ता है कई कई बार।
खेल यही !
लड़की की शादी खोजने से और होने तक का
बड़ा हाथ होता है इसमें लड़की के भी लक का|..सविता मिश्रा

Sunday, 11 May 2014

माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु --



माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु 
तेरे आँचल में रहकर सारा सुख पाया 
गलतियों की सजा ज़रूर देता है ईश्वर
पर तू ही है जिससे हमेशा माफ़ी पाया।

तेरी बखान में पूरी पोथी लिख डालूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||

तेरा आँचल है ममता से भरा भरा
तेरे आँचल में ही है मेरा संसार सारा 
सारे जहाँ ने जिसे कमजोर कह ठुकराया
उसे भी तूने ताउम्र अपने आँचल में छुपाया।

तेरी ममता के गुण जरा मैं गा लूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ।।

माँ तूने गर्भ से ही है पाला मुझको 
कष्ट हुआ न जाने कितना तुझको 
है नहीं तुझे किसी भी दर्द का तनिक भी गम 
तूने सहा मेरी नादानियों को सदा कहके कम
तूने अपनी ममता से हमेशा मुझे है दुलारा
मेरे कष्टों से तूने हमेशा मुझे उबारा 
बहका जब कभी भी मेरा कमजोर मन 
तूने रास्ता दिखाया पथ-प्रदर्शक बन।

तेरे उपकारों के गुण जरा मैं गा लूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||
माँ तूने मेरा कितना दिया है साथ 
बचपन में सिखाया चलना पकड़ कर हाथ
लिखना-पढ़ना भी तूने ही सिखाया 
बोलना एवं सम्मान करना तूने ही समझाया
संस्कारों के छीटों से तूने
यह नन्हा पौधा किया बड़ा
पर आज जो तू हो गयी बूढी 
बनना चाहिए था जब मुझको तेरी छड़ी 
मैंने तेरे दिए उन संस्कारों को भुला दिया 
अपने फर्ज को भूल तुझे अकेला छोड़ दिया।

अपने स्वार्थी तन-मन को निशदिन धिक्कारूं
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||

माँ तूने मेरे छोटे से छोटे दुःख के लिए 
अपनी सारी की सारी रैन है गंवाई 
मुझे फूलों पर सुलाने के लिए 
स्वयं काँटों पर ही सदा सोई 
मेरा पसीना बहा है जहाँ 
तूने अपना खून बहाया है वहाँ
मुझे तनिक खरोंच भी ना आये कहीं
तू ढ़ाल बनकर सदा साथ ही रही |

तेरे अहसानों के गुण जरा मैं गा लूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||

माँ तू आज कहीं खो गई
शायद स्वर्ग लोक की रानी हो गई
जब तू नहीं है मेरे आसपास कहीं
तेरी कमी मुझको बहुत ही खली
बस मुझ पर एक कृपा करना माँ
हर जन्म में तू ही मेरी माँ बनना माँ | 

ताकि तेरे आँचल का सुख फिर से मैं पा लूँ
क्योंकि तू तो है भगवान से भी अधिक दयालु ||

तेरा बखान करूँ अपार पर मैं शब्दहीन हूँ
मेरी माँ तेरे गुणों के आगे तो मैं दीनहीन हूँ।।
||सविता मिश्रा 'अक्षजा'।।