Friday, 25 July 2014

परिवेश (लघु कथा )



नन्ही सी बच्ची ऊपर से साल भर के बच्चे का बोझ; दया सी आई| अपने बच्चो के लिय पर्स में चाकलेट थी, जब नीलम ने उन दोनों को देनी चाही तो लड़की सकुचाई, नाम पूछते हुए नजरों से ही आग्रह किया, उसने शरमा कर " 'बिनुई' चाकलेट लेते हुए बोला " और "इस नन्हे का? तो बोली लालू"|
"लो बेटा" कह जब लालू को देने लगी तो उसकी नजर सारे चाकलेट पर गड़ी रही| नीलम ने उसे चारो चाकलेट दे कहा "एक-एक खाना वरना ये तुम्हारे चार नन्हे दांत ख़राब हो जायेगें"| नीलम मुस्करा कर वहाँ से चली आई ;पर आँखों के सामने वही बच्चे तैर रहे थे|
हिमा को आवाज लगा बोली "बेटा वह सब्जी का थैला जो लायी हूँ, यहाँ ले आओ| छांट ले सब्जी" | बिटिया तुनक कर बोली "मम्मी मुझसे नहीं उठ रहा तुम खुद ले लो न" |
नीलम को आज ना जाने क्यों गुस्सा आ गया "तू दस साल की है और तुझसे चार किलो का थैला नहीं उठ रहा, और गरीब बच्चों को देख, वह चार पांच साल में ही कितना भारी-भारी बोझा उठा लेते है| अपने से दूना वजन उठा, कितनी-कितनी दूर चले जाते है, बिना चेहरे पर शिकन लाये|" "मम्मी आप ऐसा है न, यह लिक्चर न पिलाया करो रोज-रोज"| "जरुर कुछ ऐसा देखकर आई होगी आप | हम जो कर लेते है वह कर सकते है क्या ?" ...कह वह मगन हो गयी टीवी देखने में|
नीलम सोच में पड़ गयी| सही तो कह रही है हिमा! जिसको जैसे परिवेश में पालेंगे वैसे ही तो बनेगा| 'क्या वह बच्ची हिमा की तरह पढ़ सकती है' 'अंग्रेजी फटाफट बोल सकती है, नहीं न'|
"मैं भी न" कह नीलम खुद ही खुद पर हंस सब्जी का थैला ले बैठ गयी .....| सविता मिश्रा

नींव की ईट (kahani)

श्याम बहुत ही होनहार छात्र था| सभी शिक्षक उसकी इतनी तारिफ करते कि माँ बाप का सीना ख़ुशी से फूल जाता था | धीरे-धीरे समय बीतता रहा अब श्याम कक्षा नौ में आ गया था| माँ को उस पर बहुत भरोसा था ,अतः ज्यादा ध्यान नहीं देती थी| राजेश के पढ़ने पर टोकने पर कहती -"बच्चा है खेलने खाने की उम्र है| ज्यादा जोर पढाई पर मत दिया करिए...|" लेकिन राजेश उसे कमरे में पढ़ता हुआ देख खुश हो जाता |

राजेश तो कक्षा आठ में ही उसके क्लास में प्रथम आने से खुश हो गए थे | और एक अच्छा सा मोबाईल लाकर उसे उपहार में दे दिया था | इस विश्वास पर कि वह इसी तरह अपनी मेहनत जारी रखेगा| वह भटक जायेगा, यह बात दिमाग़ में लाये ही नहीं थे| पर मोबाईल हाथ में आते ही वह पढाई के मार्ग से भटक गया था | अब माँ-पापा जब भी कमरे में आते| उन्हें श्याम पढ़ते दीखता| पर उन्हें क्या पता था कि श्याम तो धोखा दे रहा है| उनकी नजर बचाकर वह अब ह्वाट्सअप पर चैटिंग और नेट पर गेम खेलने में ही दिनभर लगा रहता है|

उसको पढ़ता देख उसकी मेहनत से दोनों आश्वस्त थे कि इस बार भी टॉप करेगा उनका बेटा| पर इस बार सब उल्टा हुआ, जब रिजल्ट लेने स्कूल पहुंचे | शिक्षको ने शिकायतों का पुलिंदा जैसे तैयार रखा था| एक एक कर सभी ने शिकायत कर डाली और हिदायत दी कि "आप श्याम पर अधिक ध्यान दें | बढ़ता हुआ बच्चा है, हाथ से निकल गया तो बहुत मुसीबत होगी| आपके ही भले के लिए कह रहे हैं , बुरा ना मानियेगा|"
हाथ में रिजल्ट जैसे ही आया राजेश के पैरो के नीचे से जैसे जमीं खिसक गयी, माँ को भी काटो तो जैसे खून ही नहीं, दोनों आवक रह गये| श्याम सारे विषयों में फेल था|
राजेश को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने शिक्षक से कहा "आप चिंता ना करें अगली बार मेरा यही बेटा, पहले जैसा करके दिखाएगा"|
घर पहुँचते ही श्याम को राजेश ने बुलाया, श्याम डर गया कि आज तो खैर नहीं पापा बहुत मारेगें, पर राजेश ने कुछ नहीं किया बस समझाया, "कि जिन्दगी राह इसी उम्र में मजबूत होती है, इस कड़ी को कमजोर कर दोगें तो, भविष्य की राह बहुत कठिन हो जाएगी बेटा|"
"यूँ समझो कि तुम्हारें लिए नींव की ईट है यह समय|"
श्याम की समझ आ गया उसने खुद ही अपना मोबाइल पापा को देते हुए बोला - "पापा भटकाव की जड़ है यह| इसे आप रखिये और जब मैं पढ़ -लिखकर आप की तरह गजटेड अफसर हो जाऊँगा तो आपसे, इससे भी अच्छा मोबाइल मागूँगा|" यह कह श्याम अपने कमरे में जाकर अपनी पढ़ाई करने लगा| राजेश उसकी कामयाबी के प्रति आश्वस्त हो नीलू की तरफ देख मुस्करा दिया |...सविता मिश्रा

समय रहते


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भटकाव अनगिनत
भटक तुम ना जाना

तुम बच्चे बड़े सयाने
कही लटक ना जाना
इतने सारे लुभाने
गजेट्स है आये
राह भटकावन की
बड़े जोर शोर से
तुम्हें ये दिखलाये
इन लुभावनी चीजो में
पढ़ाई को भूल ना जाना
खेल-कूद कर भी तो
शरीर को बलिष्ठ बनाना
बैठे बैठे गजेट्स में
रहोगे जो उलझे
भविष्य की डोर
उलझ के रह जायेगी
ये लुभावने वादे कर
तुम्हे खूब भरमायेगी
भ्रम में फंसे जो तुम
सुलझाने की उम्र तुम्हारी
फुर्र से निकल जाएगी
अतः समय रहते ही
जिन्दगी को सुलझाओ
मन को ऐसे मत
भ्रम जाल में भटकाओ| ..
.सविता मिश्रा

Sunday, 20 July 2014

सठिया गयी हो -

शहर के बीचोबीच खूब बड़ा पार्क था। आसपास की बिल्डिंगों से ही नहीं बल्कि थोड़ी दूरी पर रहने वाले लोग भी पार्क की सुन्दरता के कारण सुबह-शाम खिंचे हुए चले आते थे। शहरवासियों के लिए वह पार्क आकर्षण का केंद्र था। हर तरह के फूल के पौधे मौजूद थे पार्क में। बेला, चमेली और रातरानी के पौधे बहुतायत में थे। उनकी तीखी महक बड़ा सुकून देती थी। नीम के पेड़ की खुशबू बरसात में तो बड़ी सुहावनी लगती थी। कई फलदार पेड़ भी थे जिनके नीचे बड़े-बड़े चबूतरे बने हुए थे। बड़े-बुजुर्ग वहां पर आकार रोज ही मजमा लगाते थे घंटो बैठकर। कई बुजुर्ग बरगद के पेड़ के नीचे योगाभ्यास करते दिख जाते थे।
रामप्रसाद भी अपनी पत्नी संगीता के साथ कभी-कभार आ जाते थे। दोनों बेटे विदेश में जाकर बस गये थे। अब इस शहर में रामप्रसाद और संगीता ही एक दूजे के सुख-दुःख के साथी थे। रामप्रसाद को इस पार्क में आकर बैठना बहुत ही ज्यादा पसंद था। वे जब भी आते, दो-चार घंटे पार्क में ही बिता देते थे। संगीता को पार्क में टहलने से ज्यादा अड़ोस-पड़ोस के घरों में जाकर बैठकी करना पसंद था।
आज रामप्रसाद जिद कर संगीता को लेकर आये थे। पार्क में आकार एक किनारे पड़ी बेंच पर दोनों बैठ गए थे। वहां पार्क में कई नवजोड़ो को देख न जाने रामप्रसाद को क्या सूझी। अपनी जीवन संगनी के हाथों को अपने हाथ में लेकर बोले, " याद है न ऐसे पहली बार तुम्हारें हाथो को कब हमने हाथ में लिया था ?" संगीता मुस्करा दी बस। क्योंकि उसका सारा ध्यान तो पार्क में एक तीन साल के बच्चे के साथ टहलती हुई गर्भवती युवती की ओर था। उसे देख उसके मन में अजीब-अजीब ख्याल आ रहे थे।
वह सोच रही थी यह युवती तो 'पूरे दिन' से है, यहाँ अकेले कैसे टहल रही है ? वह भी तीन साल के नन्हे बच्चे के साथ। जरुर पति ने छोड़ दिया होगा। तभी तो इस हालत में भी वो, यहाँ अकेले टहल रही है। सास-ससुर को तो आज की जनरेशन बोझ मानती है, भेज दिया होगा उन्हें वृद्धाश्रम। न जाने क्या हो गया है आज की जनरेशन को। सास होती तो इसको ऐसी हालत में थोड़ी टहलने अकेले भेजती ! खुद साथ रहकर बच्चे के साथ बहू का भी इस हालत में ध्यान रखती। होगी ये खूब नकचढ़ी ! तभी तो अब देखो कोई नहीं है इसके साथ।
यह भी हो सकता है यह अकेले रहती हो। आजकल तो बहुएँ आते ही एक नया अलग घरोंदा बसा लेती हैं। हो सकता हैं लड़ बैठी हो अपने पति से। आज की लड़कियां सहना कहाँ सीखी है। हर बात में तो पति को जबाब देने लगती हैं। नहीं सहा होगा इसके मर्द ने। इस हाल में छोड़ जाने का मतलब ही है कि लड़की लड़ाकू किस्म की हैं। एक बात भी सहती न होगी | हमारा जमाना था कितना कुछ सहते थे , उफ़ तक ना करते थे कभी | तभी तो आज तक एक साथ है |
ठंडी हवा का झोंका आया तो फूलों की सुगंध से मुग्ध सी हो गई संगीता। हवा में फूलों की ताजगी उसके दिमाग को भी तरोताज़ा कर गयी थी। आँखों को भी हवा में मौजूद शीतलता ने शीतल कर दिया था। एक बारगी वह खुद से खुद को ही झकझोरती हुई बोली- 'अरे नहीं, नहीं मैं गलत क्यों सोच रही हूँ | मैं भी तो जब ये आँफिस से देर से आते थे, अकेले पार्क में टहलती थी। उस समय रिंकू पेट में था और डाक्टर की शख्त हिदायत थी कि मैं रोज टहला करूं।
और उस दिन इसी तरह टहलते हुए पार्क में ही तो मेरा दर्द शुरू हो गया था। मैं सुस्ताने के लिए पास पड़ी बेंच पर बैठ गई थी। वहीं बेंच पर बैठी एक बुजुर्ग महिला ने मेरी मदद की थी | इन्हें भी उन्होंने ही मेरे फोन से फोन कर बुलाया था। अपना वह दिन इतनी जल्दी भूल गयी। सच कहते है ये, मैं 'सठिया' गयी हूँ|'
शादी के एक साल के अंदर ही इनकी नौकरी शहर से बाहर लग गयी थी। सास ने जबरजस्ती मुझे भी इनके साथ भेज दिया था , यह कह कि मेरे बबुआ को भोजन कौन बनाकर देगा। ऑफिस से थक हार कर आएगा, तो क्या भोजन खुद बनाएगा ! इनके बहुत मना करने के बावजूद 'बहू तैयार हो जा बबुआ संग जाने को' कहकर उन्होंने सख्ती से आदेश पारित कर दिया था। पुराने दिन याद आते ही उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान तैर गयी।
उसे हँसता हुआ देख कर राम प्रसाद ने कहा, " मन ही मन क्या सोच कर खिलखिला रही हो !" संगीता के अनसुना कर देने पर आगे बुदबुदाया, " ये बुढ़िया जाने कहाँ खोयी है ?" पर सुनीता तो पास होकर भी पास कहाँ थी , वह तो दूर युवती में खुद को देख अपने खट्टे मीट्ठे दिनों में खो गयी थी।

युवती अब भी पार्क में धीरे-धीरे टहल रही थी। थोड़ी ही दूरी पर उसका बेटा तिपहिए पर उसके पीछे पीछे चल रहा था। अचानक बीटा किसी पत्थर से टकरा कर तिपहिये से गिर गया। गिरते ही वह बड़े तेज स्वरों में रोने लगा। रोने का स्वर जैसे ही संगीता के कानों में पड़ा वह वर्तमान में वापस लौट आई। उसने दौड़ कर बच्चे को उठाकर चुप कराने लगी। युवती जल्दी नहीं दौड़ सकती थी। धीरे-धीरे चलते हुए व्वह जब तक पास आई, उसका बेटा संगीता की गोद में मुस्करा रहा था। संगीता ने लाड़ करके बच्चे को बहला लिया था | युवती ने सुनीता को 'धन्यवाद आंटी' कहा और मुस्करा दी।

वे दोनों जब तक एक दूसरे से जानपहचान कर रहे थे तभी युवती संध्या का पति राकेश वहां आ गया। वह हंसते हुए संध्या से बोला, "डार्लिंग, माफ़ कर दो, आज देर हो गयी। बात ऐसी थी कि बॉस ने कुछ काम दे दिया था। और साथ में सख्त हिदायत दी कि इसको निपटाए बिना घर मत जाईएगा। बोलो, मैं क्या कर सकता था ! तुम तो जानती हो कि बॉस की तो सुननी ही पड़ती हैं। घर पंहुचा तो माँ चिल्ला पड़ी कि बहू अकेले गयी है पार्क, जा ले आ; मेरे घुटनों में दर्द था इसलिए जा नहीं सकी। तू जल्दी भाग के जा।"

संध्या मुस्कराते हुए पति से बोली, "कोई बात नहीं स्वीटहार्ट |" चिंटू अब भी मेरी गोद में बैठा था। मेरे पास आकर संध्या ने पति से मेरा परिचय कराया, "इनसे मिलो, ये संगीता आंटी हैं। इन्होंने ही चिंटू को आज सम्भाला।" राकेश ने 'नमस्ते आंटी' कह कर अपने बेटे चिंटू को गोद में लिया और संध्या का हाथ पकड़ बतियाते हुए घर की ओर चल पड़ा।

संगीता अपने बुढ़ऊ को अपनी सोच बता-बताकर खुब हंसी। बुढ़ऊ हमेशा की तरह हँसते हुए बोले, "तुम न सच में सठिया गयी हो।" कह दोनों ही ठहाके लगाने लग पड़े।

बुढ़िया हँसते-खेलते युगल को दूर जाते देख बोली, " सच में सठिया गयी हूँ' मैं|" अन्धेरा होने लगा था अतः दोनों बूढ़ा-बुढ़िया भी एक दूजे का सहारा बन घर की ओर चल पड़े, अपने खट्टे मीट्ठे अनुभव एक दूजे से बाँटते हुए।....सविता मिश्रा
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