Friday, 30 September 2016

कीमत(बाजी-)


बाजी-

"वाह भई, कलम के सिपाही भी मौजूद हैं। " पीडब्‍ल्‍यूडी के चीफ इंजीनियर साहब ने पत्रकार पर चुटकी ली।

"काहे के सिपाही। कलम तो आप सब के हाथ में हैं, जैसे चाहे घुमाये।" पत्रकार सबकी तरफ देखता हुआ बोला।
" पर पत्रकार भाई, आजकल तो जलवा आपकी ही कलम का है। आपकी कलम चलते ही, सब घूम जाते हैं । फिर तो उन्हें ऊँच-नीच कुछ नहीं समझ आता है। आपकी कलम का तोड़ खोजने के लिए जो बन पड़ता हैं, हम सब वो कर गुजरते हैं। " डाक्टर साहब व्यंग करते हुए बोल उठे।

"सही कह रहे हो आप सब। वैसे हम सब एक ही तालाब के मगरमच्‍छ हैं। एक-दूजे का ख्याल रखें तो अच्छा होगा। वरना लोग लाठी-डंडे लेकर खोपड़ी फोड़ने पर आमदा हो जाते हैं।" लेखपाल ने बात आगे बढ़ाई|

"पर ये ताकतवर कलम, हम तक नहीं पहुँच पाती है।" ठहाका मारते हुए बैंक मैनेजर बोला।
"क्यों? आप कोई दूध के धुले तो हैं नहीं।" गाँव का प्रधान बोला।
"अरे कौन मूर्ख कहता है हम दूध के धुले हैं। पर काम ऐसा है जल्दी किसी को समझ नहीं आता है हमरा खेल।" फिर जोर का ठहाका ऐसे भरा जैसे इसका दम्भ था उन्हें ।
सारी नालियाँ जैसे बड़े परनाले से मिलती हैं, वैसे ही विधायक महोदय के आते ही, सब उनसे मिलने उनके नजदीक जा पहुँचे।

"नेता जी मेरे कालेज को मान्यता दिलवा दीजिये, बड़ी मेहरबानी होगी आपकी।" कालेज संचालक बिनती करते हुए बोला ।
"बिल्कुल, कल आ जाइये हमारे आवास पर। मिल बैठकर बात करतें हैं।" विधायक जी बोले।
"क्यों ठेकेदार साहब, आप काहे छुप रहे हैं। अरे मियाँ, यह कैसा पुल बनवाया, चार दिन भी न टिक सका। इतने कम कीमत में तो मैंने तुम्हारा टेंडर पास करवा दिया था, फिर भी तुमने तो कुछ ज्यादा ही ...।"
"नेता जी आगे से ख्याल रखूँगा। गलती हो गयी, माफ़ करियेगा ।" हाथ जोड़ते हुए ठेकेदार बोला।

विधायक जी ठेकेदार को छोड़, दूसरी तरफ मुखातिब हुए, "अरे एसएसपी साहब आप भी थोड़ा ..., सुन रहें हैं सरेआम खेल खेल रहें हैं। आप हमारा ध्यान रखेंगे, तो ही तो हम आपका रख पाएंगे।" विधायक साहब कान के पास बोले।

"जी सर, पर इस दंगे की तलवार से, मेरा सिर कटने से बचा लीजिए। दामन पर दाग़ नहीं लगाना चाहता । आगे से मैं आपका पूरा ख्याल रखूँगा।" साथ में डीएम साहब भी हाथ जोड़ खड़े थे।
सुनकर नेता जी मुस्करा उठे।

सारे लोगों से मिलने के पश्चात उनके चेहरे की चमक बढ़ गई थी । दो साल पहले तक, जो अपनी छटी कक्षा में फेल होने का अफ़सोस करता था। आज अपने आगे-पीछे बड़े-बड़े पदासीन को हाथ बाँधे घूमते देख, गर्व से फूला नहीं समा रहा था।

तभी सभा कक्ष के दरवाजे पर खड़ा हुआ एक नौजवान सबसे मुखातिब हुआ। उसने विनम्रता से कहा, ‘’और मैं एक किसान परिवार का बेटा हूँ। जिसकी पढ़ाई करवाते-करवाते पिता कर्जे से दबकर आत्‍महत्‍या कर बैठे। परिवार का पेट भरने के लिए मुझे चपरासी की नौकरी करनी पड़ रही है। पर मुझे आज समझ आया कि मेरे पिता की आत्‍महत्‍या और मेरे परिवार को इस स्थिति में लाने में आप सबका हाथ है। आपका कच्‍चा चिठ्ठा अब मेरे पास है।‘’
बाजी पलट चुकी थी! विधायक से लेकर ठेकेदार तक, सब एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे।

Tuesday, 6 September 2016

~~हिम्मत का बीज~~कहानी



रामलीला मैदान में राम द्वारा चलाये बाण से घायल रावण अट्टहास करता हुआ वीर गति को प्राप्त हुआ | रामलीला मंचन को देख आठ साल की तरु पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा |
"पापा ये रावण इतनी जोर से हंसा क्यों ?" सवाल सुनकर भी पिता ने बात टाल दी
घर आके मम्मी-पापा से फिर वही सवाल | पर पापा ने यह कह कि "कल बात करेंगे बेटा अभी घूम-घाम के थक गये | अब चलो सो जाओ |" फिर से बात को अनसुनी कर दिए |

पर नन्ही तरु के मन में सवाल अब भी गूंज रहा था कि आखिर रावण मरते समय हंसा क्यों ? "कोई हँसता हैं क्या मरते हुए , मम्मी ?"
"न कोई न | अब सो जा |" माँ हँसते हुए बोली |

तरु के क्यों? कब ? कैसे मारे गये रावण? के सवालों से घायल ,थके-हारे दोनों बड़े प्यार से उसको सुलाकर खुद भी सो गये |

सुबह-सुबह तरु की चीखने की आवाज से निर्मला उठ बैठी| पसीने से तरबतर तरु को सीने से लगाती हुई बोली "क्या हुआ बेटा ? कोई बुरा सपना देखा ?"
"मम्मी ,आप कहती हैं सुबह के सपने सच होते हैं न ? "
"हाँ, बेटा बड़े-बुजुर्ग तो यही कह गये हैं !!"
"मम्मी वो रावण ...." उसकी सांस अटक रही थी |

"क्या रावण ? " माँ समझ गयी दिमाग पर तरु के रावण ही छाया हैं उसी का सपना देख डर गयी हैं | तरु को समझाते हुए बोली "ऐसा क्या देखा बेटा ? जो इतना डर गयी |"
सिसकते हुए तरु सपने में देखा गया सारा वितांत सुनाने लगी |

मम्मी मैंने देखा कि , ' रावण अट्टहास कर रहा था क्योकि उसने देखा कि इस रामलीला मैदान में ज्यादतर लोग उससे भी ज्यादा गये-गुजरे हैं | उसने तो मर्यादा में रहकर सीता का अपरहण किया था, पर यहाँ उपस्थित लोगो की आँखों में मर्यादा नहीं दिख रही। अपनी विकराल छवि युवाओं में देख वह पुनः अट्टहास कर बैठा | उसकी निगाहों में साफ़ झलक रहा था कि 'हे राम ! तुम तो अकेले ही मुझ एक को मार गिराए ; पर कलयुग में तो मैं सहस्त्र रूपो में रहूँगा और तुम ! तुम तब तक रहोंगे ही नहीं | फिर क्या करोंगे | मैं आज भी हूँ और कल भी रहूँगा | मैं सास्वत हूँ ! मैं मारा नहीं जा सकता | जितनी बार मरूँगा उतनी बार उसके चार गुना अधिक रूपो में जन्म लूँगा | "

राम घबरा गये और अपने धनुष-बाण को रख दिए | विभीषण -लक्ष्मण ने बहुत समझाया पर राम को उनमें भी रावण दिखने लगा | जैसे कह रहा हो 'मारो राम ! जैसे मैं कई रूपों में जन्म लेता रहूँ मेरी संख्या बढ़ती रहें | जैसे-जैसे मैं मरूँगा विभत्स रूप में चार से दस गुना अधिक ताकतवर हो जन्म लूँगा | ' रावण बार-बार यह कह अट्टहास करता रहा और राम असहाय से खड़े रहें |' सपने में घटित वितांत सुना तरु सीने से चिपक गयी माँ के ।

"कहा था मत ले चलो दिखाने, पर मेरी सुनता कौन हैं इस घर में !" पति पर नाराज होते हुय चिल्लाई।
"देख लिया न बच्ची डर गयी हैं | पर नहीं चलो दिखा लाऊं तरु को भी रामलीला | अपने परम्पराओं और संस्कृति से परिचय करा लाऊ| लो अब भुगतो |"

"कुछ नहीं मेरी बच्ची ये बस एक सपना हैं | डर मत | रावण को हम मिल मार गिरायेंगे | रावण से डरना नहीं चाहिए बल्कि अपने में हिम्मत पैदा कर लड़ना चाहिए | जैसे राम-लक्ष्मण लड़ें |"

"पर मम्मी रावण तो सब में हैं | कैसे मारेंगे ?कितने मारेंगे ? हम तो कमजोर हैं ना ? आप तो कहती हैं कि मेरी बिटिया फूल सी हैं | फिर पत्थर से कैसे जीत पाऊँगी ?"
"बिटिया फूल भी यदि दृढ निश्चय कर लें तो पत्थर में भी सुराग कर उग आता | पर पत्थर कुछ नहीं कर सकता |" समझाती हुई माँ बोली

"पर मम्मा पत्थर कुचल सकता हैं ना और तोड़ भी सकता हैं ?"
"हा कुचल सकता ,पर कुचलने पर भी फूल अपनी सुगंध चहुँ दिशा में फैला देगा | पानी बहुत मुलायम और सरल होता पर लगातार पड़ने पर वह पत्थर में छेद कर देता हैं बेटा |
मन में जब विश्वास भर कोई बता ठान ली जाये तो कुछ भी असम्भव नहीं हैं 'मेरी नन्ही कली '| जानती हैं एक चींटी भी हाथी को मार सकती हैं और देख रामलीला में भी तो तूने देखा ना सुकोमल सीता शक्तिशाली रावण से बिल्कुल भी नहीं डरी | अडिग हो खड़ी रही अपनी बात पर| उन्होंने रावण केअहंकार को चूर-चूर कर दिया |"

पापा ने तरु से कहा कि "रावण इसी लिए ठठाकर हंसा था कि इतना ताकतवर होते हुए भी वह मारा गया | समझी ...मेरी लाडो |"
हा हा हा खिलखिला पड़ी तरु | उसको हंसता देख माता-पिता भी मुस्करा पड़े |
खिलखिलाते हुए तरु बोली , "मम्मी मैं भी सीता की ही तरह बिल्कुल नहीं डरूंगी , बल्कि लड़ कर हरा दूंगी रावण को, आने दो अब सामने | देखती हूँ कितनी शक्ति हैं रावण में !! डिशुम-डिशुम -डिशुम ....| ये मारा, वो मारा .....|
बिटिया में हिम्मत का बीज रोपित हो चूका था | माता-पिता ने खिलखिलाती हुई तरु को सीने से लगा संतोष की साँस ली |..सविता मिश्रा