Friday, 12 May 2017

इज्‍जत-

"काकी,ओ काकी कहाँ हो ?"
"अरे बिटिया आओ-आओ बईठो | बड़े सालों बाद दिखी | ये तेरी बिटिया है न कित्ती बड़ीहो गयी हैं | "
"हाँ काकी दसवीं में पढ़ रही ।"
"सुना ही होंगा तेरे काका और भाई एक्सीडेंट में ...मुझे तो एक ही चिंता खाय जा रही ,सुंदर मेहरिया जमाने में कैसे जियेगी, मैं कब तक रहूंगी ,आज गयी कि कल |" कह सुबकने लगी |
"काकी क्या कहूँ इस दुःख की घड़ी में ,सुनी तो दौड़ी आई |"
"पहाड़ सी जिनगी कैसे काटेगी उसकी, वह भी इस दुधमुहें के साथ |"
"मैं कुछ कहूँ काकी ?"
"हाँ बोल बिटिया !"
"इसकी शादी मेरे बेटे से करवा दो | मेरा बेटा अभी तक कुंवारा है , शायद किस्मत को यही मंजूर हो |"
" पर यह बच्चा ?"
"पर-वर छोड़ काकी ,मेरा बेटा अपना लेगा इस बच्चे को ।"
"पर समाज क्या कहेगा ?"
"कोई कुछ न कहता काकी , कित्ता दूर का रिश्ता है अपना | कोई नजदीकी रिश्ता तो है न कि समाज बोलेगा | और समाज का क्या हैं ,कुछ न कुछ बोलता ही हैं | और दूजी बात हम यहाँ कौन सा रहते, रहते तो शहर में हैं न | कुछ कहेंगा भी तो कौन सुनने आ रहा |"
"बहू से पूछ लूँ |"
"हाँ काकी समझा उसको ।"
थोड़ी देर में ही काकी ने लौटकर अपनी सहमति की मुहर लगा दी |
घर वापिस जाते हुऐ बेटी माँ से बोली "मम्मी, ये क्या कर रही हैं आप |एक तो ये वैसे ही दुखी हैं ऊपर से आप काँटों का ताज पहना रही हैं |"
"चुप कर मुई |कोई सुन लेगा | समाज में इज्जत बनी रहें इसके लिए बहुत कुछ करना होता | और फिर मैं तो उसे एक छाँव दे रही हूँ |"
" मर्द के नाम की छाँव , भले ही वह नामर्द है।"
========================================= .Savita Mishra​

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